रविवार, 29 मार्च 2026

मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक

 मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक                                                                                                                  

        सन् 2021 के अगस्त महीने की पांचवीं तिथि-शिक्षक दिवस को माननीया ज्योति भाभी  के फेशबुक पोस्ट के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ कि शिक्षकों के मसीहा बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ,सीवान के पूर्व सचिव दिनेश चंद्र सिन्हा जी का निधन उनकी कर्मभूमि सिवान जिले के गोरेयाकोठी प्रखंड के भिट्टी में 17मई 2021सोमवार को दिल का दौरा पड़ने से हो गया है। इस घटना से मैं काफी मर्माहत और शोकग्रस्त हो गया।क्योंकि वे मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक तथा अनुकरणीय व्यक्तित्व थे। वे तपी प्रसाद उच्च विद्यालय, भिट्टी के संस्थापक प्रधानाध्यापक थे तथा यहीं से अवकाश भी प्राप्त किए। वे कई संस्थाओं के संस्थापक थे।वे तपी प्रसाद उच्च विद्यालय भिट्टी के कुशल तथा कर्मठ प्रधानाध्यापक रहे एवं हमेशा विद्यालय में शिक्षा के स्तर तथा प्रशासन के प्रति जागरुक एवं इमानदार रहे।यही कारण है कि उनके निधन पर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष विधान परिषद सदस्य श्री केदरनाथ पांडेय  ने शोक व्यक्त करते हुए कहा था कि बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ की मजबूती और इसके         विभिन्न आंदोलनों में उनकी भूमिका अग्रणी की सूची में रही है।माध्यमिक शिक्षक संघ को सांगठनिक रूप से मजबूत और समृद्ध बनाने में श्री सिन्हा का बड़ा योगदान रहा है। तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्ठी में कार्यरत रहने के दौरान तथा बाद में भी मैं उनकै पास अक्सर ही जाया करता था तथा उनसे मार्गदर्शन लिया करता था। उनका मार्गदर्शन तथा व्यक्तित्व मुझे आज भी प्रभावित कर रहा है।मैं दिनांक 5 दिसंबर 2006 से 6अगस्त 2010 तक तपी प्रसाद उच्च  विद्यालय,भिट्ठी में कार्यरत था।उस अवधि में मैंने उनको काफी नजदीक से देखा था।


                                    वर्त्तमान समय में मैं झारखण्ड राज्य के पूर्वीसिंहभूम जिले के चाकुलिया नगर पंचायत में स्थित मनोहरलाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक के पद पर कार्य करते हुए अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूँ,परन्तु मेरे इस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता उनके द्वारा स्थापित तथा सिंचित तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्टी,सिवान से होकर आता है। 5 दिसम्बर 2006 का वह सुनहला दिन,जिस दिन मैं प्रधानाध्यापक श्री मोतीलाल शर्मा के अधीन जिला परिषद माध्यमिक शिक्षक के पद पर योगदान किया था,मेरे लिए एक बहुत ही खुशी का दिन था,क्योंकि मेरे मन में एक उज्ज्वल भविष्य की कामना थी। मेरे योगदान के कुछ ही दिनों बाद मेरे पद की कोटि में ही छः अन्य शिक्षक भी योगदान दिए। इस विद्यालय में मैं 3 वर्ष 8 महीने तक कार्यरत रहा। झारखण्ड लोक सेवा आयोग,राँची द्वारा सहायक शिक्षक के पद पर चयनित हो जाने के कारण मैं सम्बन्धित विद्यालय में योगदान करने हेतु 6 अगस्त 2010 को विद्यालय से पदमुक्त हो गया।

            सिवान जिला मुख्यालय से करीब 32 कि. मी. दूर स्थित यह विद्यालय शिक्षा का आलोक फैलाकर जन-मानस को तृप्त कर रहा है।न जाने कितने रत्न यहाँ से निकले तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी आभा फैलाकर कीर्त्तिमान स्थापित कर रहे हैं,इसकी कोई गणना नहीं तथा भविष्य में भी ऐसा ही होता रहेगा।स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी द्वारा सिंचित यह विद्यालय अमूल्य कीर्ति के रुप में अनन्त समय तक बाल शिक्षा पिपासुओं की शिक्षा रुपी पिपासा को शान्त करता रहेगा। इस कार्य के लिए मैं विद्यालय की स्थापना में योगदान तथा त्याग करने वाले विद्यालय के संस्थापक सदस्यों में स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने इस विद्यालय को अपने खून तथा पसीने से सींचा,जिसके बदौलत यह विद्यालय सिर्फ जिले में ही नहीं अपितु पूरे राज्य में प्रसिद्ध हो गया। उनके द्वारा विद्यालय में बनाई गई व्यवस्थाएं तथा अनुशासन, जब मैं विद्यालय में योगदान किया,उस समय तक प्रभावी थीं तथा आगे भी जारी रहीं। विद्यालय में पूर्व से काम कर रहे साथीं शिक्षकों के माध्यम से मुझे  उनके द्वारा विद्यालय में किए गए कार्यों के बारे में बहुत सारी जानकारियां तथा प्रशंसाएं सुनने को मिलती थीं।उनके द्वारा विद्यालय में बनायी गयीं अच्छी परम्पराएँ मुझे कहीं अन्य विद्यालयों में देखने को नहीं मिलीं।विद्यालय का वातावरण  शांतिपूर्ण रहता था। सभी शिक्षक प्रेमपूर्वक अध्यापन कार्य करते थे। विद्यालय के सभी शिक्षक समय पर पहुँचते थे। सुबह प्रार्थना के बाद रोजाना एक-एक शिक्षक के द्वारा समाचार -वाचन का कार्यक्रम होता था,जो मुझे बहुत ही अच्छा लगता था। मैं भी सप्ताह में एक दिन समाचार वाचन करता था। समाचार वाचन से छात्र-छात्राओं को बहुत ही जानकारियां होती थी। वे लोग अपने आस-पास की राजनीतिक, सामाजिक,आर्थिक तथा अन्य सभी गतिविधियों से परिचित होते थे। 15 अगस्त तथा 26 जनवरी के आने के पहले विद्यालय के छात्र-छात्राओं को व्यायाम तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम की खूब तैयारी करायी जाती थी।इन सभी कार्यक्रमों के पीछे स्वर्गीय सिंह जी द्वारा पूर्व में बनायी गयीं अच्छी परम्पराओं का महत्त्वपूर्ण योगदान था।                                                                                            मैंने तीन प्रधानाध्यापकों का कार्यकाल देखा।श्री मोतीलाल शर्मा जी के सेवा निवृत्त होने के बाद श्री सच्चिदानन्द मिश्र प्रधानाध्यापक बने तथा उनके सेवानिवृत्त होने के बाद श्री ललित कुमार पाण्डेय प्रधानाध्यापक बने।इन सभी के कार्यकाल में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। विद्यालय में छात्रों को व्यायाम  कराने में दो शिक्षक श्री सच्चिदानन्द मिश्र तथा श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहा जी की बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी।खेल कूद से सम्बन्धित कार्य तथा लडकों को प्रशिक्षण श्री ललित कुमार पाण्डेयजी पूरी मेहनत से करते थे।वे लोग कड़ी मेहनत करके लडकों को तैयार कराते थे। हम सभी शिक्षक उनका सहयोग करते थे।प्रत्येक शनिवार को भी ये लोग व्यायाम तथा खेल कराते थे। इन वरिष्ठ शिक्षकों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विद्यालय की ये अच्छी परम्पराएँ मुझे कहीं अन्य विद्यालयों में देखनेको नहीं मिली।सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु मैं भी सक्रिय रुप से भाग लेता था। कई बार संस्कृत के पद्यों का छात्र-छात्राओं से सस्वर वाचन कराता था,जो कि सुनने में बहुत ही अच्छा लगता था।मुझे याद है कि मैंने एक बार पूर्ण रूप से अपने नेतृत्व में छात्रों को अंधेर नगरी चौपट राजा नाटक को तैयार कराया था तथा 15 अगस्त के शुभ अवसर पर सफलतापूर्वक मंचन भी कराया था। सांस्कृतिक कार्यक्रम में विद्यालय के दो शिक्षक एहसान अहमद तथा मोहम्मद आजम भी प्रायः मधुर गीत और शायरी सुनाया करते थे,जिनको सुनने के बाद मन आनन्दित हो जाता था।                                                                                                     गणित के शिक्षक श्री लक्षमण  पाण्डेयजी, हिन्दी के शिक्षक श्री सच्चिदानन्द मिश्र जी, समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री रमेश सिंह जी अपना अनुभव बाँटते थे।वे अवकाश की घण्टी में बहुत सारी अच्छी कहानियाँ तथा प्रसंग सुनाया करते थे,जिससे हमें बहुत सीख मिलती थी। अंग्रेजी के शिक्षक श्री मुस्तकमीन अंसारी तथा विज्ञान के शिक्षक श्री वीरेन्द्र सिंह भी अपने अनुभव तथा अच्छी बातें बताते थे,जिनसे हमें प्रेरणा मिलती थी। ये सभी बीच-बीच में हंसाने वाले चुटकुले भी कहा करते थे,जिससे हम सभी उदास मन को काफी तसल्ली मिलती थी। सामाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री चन्द्रप्रकाश प्रसाद जी तथा सोहेल अहमद जी, शारीरिक शिक्षक श्री कुबेरनाथ सिंह जी, उर्दू और फारसी के शिक्षक श्री एहसान अहमदजी तथा श्री म० आजमजी और विज्ञान के शिक्षक श्री रवीन्द्र वर्मा जी ये सभी हमारे समान उम्र के थे। इनसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर तथा विषय से सम्बन्धित भी अवकाश को घण्टो में चर्चाएँ चलती थी। सभी सौहार्द पूर्ण वातावरण में अपना विचार व्यक्त करते थे। शारीरिक शिक्षक श्री कुबेर नाथ सिंहजी हमलोगों के बीच एक मनोरंजन के पात्र थे,क्योंकि वे चिढते बहुत थे,हलाँकि थोड़ी देर में ही वे प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण बातें करने लगते थे। हम सभी प्रायः मनोरंजन हेतु उनको चिढ़ाते रहते थे। वे बच्चों को व्यायाम पूरी लगन तथा मेहनत से कराते थे तथा खेल भी करवाते थे। इसके अलावे वे हिन्दी की कक्षा भी लेते थे। विद्यालय के लिपिक श्री शिव जी सिंह तथा चपरासी श्री अदालत सिंह हमेशा अपने कार्यो में व्यस्त रहते थे। वे लोग व्यस्ततता के दिनों में अतिरिक्त भी मेहनत करते थे। श्री अदालत सिंह विद्यालय में रहकर रात्रि प्रहरी का भी काम करते थे।समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहा जी हमें अपना व्यवहारिक अनुभव बताते थे तथा मुझे स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने के लिए प्रेरित करते रहते थे।वे अपने विषय के साथ-साथ संस्कृत विषय भी पूरी लगन और श्रद्धा से पढ़ाते थे। उनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिला।प्रधानाध्यापक श्री ललित कुमार पाण्डेयजी से भी हमें बहुत सहयोग मिला,वे बहुत ही सहनशील व्यक्ति थे।वे लोगों के क्रोधपूर्ण बातों को भी हँसीपूर्वक टाल देते थे। विद्यालय छोड़ने के समय कागजी कार्रवाई में मुझे बहुत सहयोग मिला।उनके अधीन मैं बहुत अधिक दिनों तक कार्य किया। वे विद्यालय को आदर्श पूर्ण तरीके से चलाने का प्रयाश करते थे। उनका यह स्वभाव मुझे विशेष रूप से पसन्द था।मेरे जीवन पर विद्यालय का अमिट छाप पड़ा।इस विद्यालय के माध्यम से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला तथा अनुभव भी प्राप्त हुआ।एक तरह से यह विद्यालय मेरी तपोस्थली थी,जहाँ कम वेतन पर अधिक कार्य कर एक आदर्श स्थापित करना था। इसके लिए मैंने भरपूर प्रयास किया और इस काम में मैं कहाँ तक सफल हो सका,यह मुझे मालूम नहीं।मेरा सही मूल्यांकन तो उस समय के शिक्षक तथा छात्र ही कर पायेंगे। आज मैं अपनों से दूर, पहाड़ और घने जंगलों के बीच मैं यह सोचकर विचलित हो जाता हूँ कि काश वहाँ यदि सम्मानजनक वेतन मिला होता तो वहाँ के छात्र-छात्राओं के बौद्धिक विकास में अपना मामूली-सा योगदान दे पाता तथा मैं भी आनन्दपूर्वक अपने कर्तव्य के द्वारा स्वयं को सन्तुष्ट कर पाता।                                                                                      स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी का जन्म 12 जून 1943 को बिहार के सारण जिले के पीरारी डीह गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम स्वर्गीय राम चरित्र सिंह तथा माता का नाम स्वर्गीय शीतला देवी था। इन्होंने सन् 1957 में मीठापुर के दयानंद विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा सन् 1959 में पटना विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट की परीक्षा,सन्1969 में ग्रेजुएट की परीक्षा तथा  सन्1971एमए की परीक्षा पास की में पास की।इनका शुभ विवाह 2 जुलाई 1965 को पटना के ग्राम-सेल्हौरी दुल्हिन बाजार के स्वर्गीय राम श्याम चरण सिंह की सुपुत्री कृष्णा सिंह से हुआ। इनके तीन भाई थे।ये तीन भाइयों में सबसे यह छोटे थे। इनके दो बड़े भाई स्वर्गीय बनारसी सिंह तथा बलराम सिंह थे। इनकी एक बड़ी बहन स्वर्गीय भागमती देवी थी। जिनका विवाह गिट्ठी के सम्मानित वर्मा परिवार में विद्यालय में संस्थापक सचिव स्वर्गीय राम आशीष वर्मा से हुआ था,जिनका प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को  पुण्यतिथि

 मनायी जाती है।विद्यालय में इनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित है। स्वर्गीय राम आशीष वर्मा इनके पूरे परिवार के लिए आदरणीय थे एवं कुशल अभिभावक की भूमिका में हमेशा मार्गदर्शन करते थे।उनके परिवार का सहयोग आज भी प्राप्त होता रहा रहा है। इन के तीन सुपुत्र हैं।जिनमें सबसे बड़े सुपुत्र सुमन कुमार इन्हीं का अनुसरण करते हुए उच्च विद्यालय में शिक्षक हैं। इनकी बहू श्रीमती ज्योति कुमारी सफलतापूर्वक अपने आवास के पास ही


विद्यालय को संचालित कर रही हैं। मझले सुपुत्र सिवान में व्यवसाय किए हुए हैं तथा सबसे छोटे पुत्र डॉ पंकज कुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इनकी दो पुत्रियां हैं,जिनमें पूनम कुमारी सभी भाइयों से बड़ी हैं, वे भी इन्हीं का अनुसरण करते हुए शिक्षिका हैं तथा सबसे छोटी सुपुत्री  वंदना कुमारी सेल में अभियंता के पद पर कार्यरत हैं।इस प्रकार इनके द्वारा विद्यालय के साथ-साथ पूरे परिवार को भी अच्छे संस्कार से संस्कारित किया गया, जो आज भी विभिन्न क्षेत्रों में सेवा का कार्य कर रहे हैं।


 

अपनी ही बलि दे दी

 अपनी ही बलि दे दी

 सन् 2020 के अगस्त महीने की पांचवी तारीख को संचार माध्यमों के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ कि गरीबों के वास्तविक मसीहा धर्मेंद्र वर्मा उर्फ मुन्ना वर्मा जी का निधन हो गया है। इस घटना से मैं काफी मर्माहत और शोकग्रस्त हो गया,क्योंकि गरीबों के मसीहा तो बहुत लोग अपने को कहते फिरते हैं,परंतु वास्तविक रूप से  गरीबों का मसीहा मैंने उनके व्यक्तित्व में अनुभव किया था। मैं दिनांक 5 दिसंबर 2006 से 6अगस्त 2010 तक तपी प्रसाद उच्च  विद्यालय में कार्यरत था।उस अवधि में मैंने उनको काफी नजदीक से देखा था।प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को विद्यालय के संस्थापक सचिव स्वर्गीय श्री राम आशीष शर्मा जी के पुण्यतिथि के अवसर पर आसपास के बहुत सारे गरीब लोगों को उनके द्वारा कंबल का वितरण किया जाता था और विद्यालय के सभी छात्र छात्राओं को पुस्तिका एवं कलम का वितरण किया जाता था।यही नहीं विद्यालय के हम सभी कर्मचारियों को भी उनके द्वारा सम्मानित किया जाता था।इसके साथ ही इस अवसर पर लोगों के मनोरंजन के लिए खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन भी कराया जाता था। मैंने अपने जीवन में पहली बार इतना बड़ा त्याग और समर्पण करते हुए किसी व्यक्तित्व को देखा था और उन्हीं से प्रेरित होकर मैं अपने जीवन में प्यार और समर्पण की भावना को उतारने का प्रयास करता हूँ।वर्त्तमान समय तक बहुत सारे अमीर और अपने आप को गरीबों का मसीहा कहने वाले व्यक्तियों से मेरा संपर्क हुआ।मैंने सब में मुन्ना वर्मा जी के व्यक्तित्व को देखने का प्रयास किया,लेकिन कोई भी व्यक्तित्व उन पर खरा नहीं उतरा कविवर भूपति ने ठीक ही कहा है-

                                       संपत्ति लखिकै कृपिन की, करौ न मन में भूल। 
                                       सुनबे   ही   होत है,    ज्यौं    गुलरी के  फूल।। 
           बल्कि ऐसे लोग मिले जिनके पास अपार संपत्ति है पर चवन्नी पैसे का मदद गरीबों को नहीं करते वरन् उनका उल्टे शोषण करते हैं। ऐसे लोगों से मुझे सख्त घृणा होती है और मुझे कविवर वृंद का प्रसिद्ध दोहा स्मरण आता है-
                                      स्वारथ के सबही सगे, बिन स्वारथ कोउ नाहिं।
                                      सेवै पंछी सरस  तरु, निरस  भये  उड़  जाहिं।।
            इस संसार में बिना स्वार्थ का कोई भी नहीं है,परंतु वर्मा जी के व्यक्तित्व में स्वार्थ की भावना मुझे बहुत कम ही देखने को मिली।संचार माध्यमों से मुझे पता चला कि भिट्टी पंचायत में स्थित उच्च विद्यालय में उस समय कोरोना महामारी से बचाव के लिए कोरोंटाईन सेंटर बनाया गया था,जहां उन्होंने बढ़-चढ़कर लोगों को सहयोग किया उन्हें सुविधाएं प्रदान की,यही नहीं आसपास के लोगों को भी उन्होंने बहुत ही सहयोग प्रदान किया।अपनी जान की परवाह किए बिना जनता की सेवा करते रहे और इसी दरमियान् कहीं वे कोरोनावायरस से संक्रमित हो गए और उनको नहीं बचाया जा सका और सन 2020 के 4 अगस्त को उन्होंने मौत को गले लगा लिया। लोगों की भलाई करते हुए वे एक तरह से गुमनाम शहीद हो गए। गुम नाम मैं इसलिए कह रहा  हूँ, क्योंकि लोग समझते हैं कि देश की रक्षा करते हुए या युद्ध करते हुए जो शहीद होता है वही शहीद है,परंतु मेरा मानना है कि वर्मा जी ने भी कोरोना से बेहाल लोगों की सेवा करके एक तरह से एक सच्चे देशभक्त की तरह देश सेवा ही करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए।बहुत सारे लोग अलग-अलग तर्क देते हुए उन्हें शहीद नहीं मानेंगे,परंतु उन्हें मैं शहीद ही मानता हूँ ।इसलिए मैं उन्हें गुमनाम शहीद से संबोधित कर रहा हूँ। महान् संत कवि तुलसीदास ने कहा है कि दूसरों का परोपकार करते हुए जो शरीर का त्याग करता है, उसकी प्रशंसा संत लोग भी करते हैं-
                                                   परहित लागि तजइ जो देही ।
                                                   संतत   संत   प्रसंसहि  तेही।। 
        और यही नहीं उन्होंने परोपकार को ही सबसे बड़ा धर्म बताया है- 
                                                   परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
                                                   पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।
         देश की आजादी के बाद से लेकर आज तक भिट्ठी पंचायत का मुखिया वर्मा परिवार के किसी सदस्य को छोडकर दूसरा कोई  भी नहीं हुआ।इसका कारण वर्मा परिवार की परोपकार की भावना तथा दीन-दुखियों की सेवा ही है। मुन्ना वर्मा जी ने अपने पूर्वजों के द्वारा बनाए गए धरोहर परोपकार की भावना तथा दीन-दुखियों की सेवा को अक्षुण रखा। उनके पितामह स्वर्गीय रामाशीष वर्मा द्वारा स्थापित किया गया तपी प्रसाद उच्च विद्यालय, प्राथमिक और मध्य विद्यालय,उनके पिता स्वर्गीय केशव वर्मा द्वारा स्थापित किया गया रामाशीष बालिका उच्च विद्यालय, वर्मा परिवार की अमर कृतियाँ है,जो सिवान जिला मुख्यालय से 32 किलोमीटर की दूर सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा का आलोक फैला रहे हैं। न जाने कितने प्रतिभा रूपी तारे यहां से निकलकर समाज रूपी आकाश में खिल रहे हैं। जिनकी गणना नहीं की जा सकती और यह अनंत समय तक क्षेत्र में शिक्षा की ज्योति को फैलाता रहेगा।ये सभी विद्यालय वर्मा परिवार के त्याग और परोपकार का प्रतीक है।वे अपनी कीर्ति से आज भी अमर है। वित्त,चित्त, जीवन और जीवनी- ये सभी नश्वर है पर जिसकी कीर्ति है,उसी को जिया या अमर कहते हैं-
                                                    चलं   वित्तं   चित्तं चले  जीवित   यौवने ।
                                                    चलालिमदं सर्वं कीर्तिर्यस्य स जीवति।। 
             धन की तो तीन ही गतियाँ होती हैं- दान,भोग और नाश। जो दान और भोग नहीं करता है, उसका धन नष्ट हो जाता है।परंतु वर्मा परिवार के लोग अपने धन का उपयोग परोपकार और दीन-दुखियों की सेवा  में करके अमर हो गए। किसी ने ठीक ही कहा है-
                                                   दान भोग अरु नास जे रतन सु धन गति तीन ।
                                                   देत न   भोगत   तासु   धन, होत नास में लीन।।
              मुन्ना बाबू  के पिता स्वर्गीय केशव वर्मा जी भी एक शांत और सौम्य व्यक्ति थे। मैं अक्सर उनसे मिला करता था।वे मुझे बहुत अच्छी बातें बताया करते थे। तपी प्रसाद उच्च विद्यालय के बगल में स्थित उनके द्वारा स्थापित  रामाशीष वर्मा बालिका उच्च विद्यालय क्षेत्र के बालिकाओं में शिक्षा का आलोक फैला रहा है। मुन्ना वर्मा  ने पूर्वजों के परोपकार और दानशीलता का अनुसरण किया। ठीक ही कहा गया है- 
                                                  बाढै पूत  पिता के  धर्मा। 
                                                  खेती उपजै अपने कर्मा।। 
              अंत में वर्मा परिवार के संबंध में कविवर रहीम का दोहा उद्धृत करना चाहूंगा-
                                                 जे गरीब पर हित करै ते रहीम बड़ लोग।                                                                                                           कहाँ सुदामा  बापुरो कृष्ण मिताई जोग।। 

मेरी तपोस्थली

मेरी तपोस्थली

         आज मैं झारखण्ड राज्य के पूर्वीसिंहभूम जिले के चाकुलिया नगर पंचायत में स्थित मनोहरलाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक के पद पर कार्य करते हुए अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूँ,परन्तु मेरे इस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्टी,सिवान से  होकर आता है। 5 दिसम्बर 2006 का वह सुनहला दिन,जिस दिन मैं प्रधानाध्यापक श्री मोतीलाल शर्मा के अधीन जिला परिषद माध्यमिक शिक्षक के पद पर योगदान किया था,मेरेलिए एक बहुत ही खुशी का दिन था,क्योंकि मेरे मन में एक उज्ज्वल भविष्य की कामना थी। मेरे योगदानके कुछ ही दिनों बाद मेरे पद की कोटि में ही छः अन्य शिक्षक भी योगदान दिए। इस विद्यालय में मैं 3 वर्ष8 महीने तक कार्यरत रहा। झारखण्ड लोक सेवा आयोग,राँची द्वारा सहायक शिक्षक के पद पर चयनित हो जाने के कारण मैं सम्बन्धित विद्यालय में योगदान करने हेतु 6 अगस्त 2010 को विद्यालय से पदमुक्त हो गया।
             सिवान जिला मुख्यालय से करीब 32 कि. मी. दूर स्थित यह विद्यालय शिक्षा का आलोक फैलाकर जन-मानस को तृप्त कर रहा है। भिट्ठी के सम्मानित वर्मा परिवार की यह अमूल्य कीर्ति अनन्त समय तक बाल शिक्षा पिपासुओं की शिक्षा रूपी पिपासा को शान्त करता रहेगा। न जाने कितने रत्न यहाँ से निकले तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी आभा फैलाकर कीर्त्तिमान स्थापित कर रहे हैं,इसकी कोई गणना नहीं तथा भविष्य में भी ऐसा ही होता रहेगा। इसकार्य के लिए मैं विद्यालय की स्थापना में योगदानऔर त्याग करने वाले सभी महानुभावों का आदर सहित नमन करता हूँ। विशेष रूप से मिट्ठी के वर्मा परिवार के स्व० रामाशीष वर्मा जी को मैं कोटि-कोटि नमन करता हूँ और आशा करता हूँ कि विद्यालय प्रांगण में स्थित उनकी मूर्त्ति जन मानस के त्यागका प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।मैं विद्यालय में संस्कृत और हिन्दी विषय का नियमित अध्यापन कराता था। कभी-कभी गणित और विज्ञान की भी कक्षाएँ लिया करता था,क्योंकि इण्टरमीडिएटस्तर तक मैं गणित और विज्ञान विषय का अध्ययन किया था, जिसके कारण ऐसा संभव हो पाता था। मैंने तीन प्रधानाध्यापकों का कार्यकाल देखा।श्री मोतीलाल शर्मा जी के सेवा निवृत्त होने के बाद श्री सच्चिदा-जन्द्र मिश्र प्रधानाध्यापक बने तथा उनके सेवानिवृत्त होने के बाद श्री ललित कुमार पाण्डेय प्रधानाध्यापक बने।इन सभी के कार्यकाल में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। विद्यालय का वातावरण प्रायः शांतिपूर्ण रहता था। सभी शिक्षक प्रेमपूर्वकअध्यापन कार्य करते थे। विद्यालय के सभी शिक्षक समय पर पहुँचते थे। सुबह प्रार्थना के बाद रोजाना एक-एक शिक्षक के द्वारा समाचार -वाचन का कार्यक्रम होता था,जो मुझे बहुत ही अच्छा लगता था। मैं भी सप्ताह में एक दिन समाचार वाचन करता था। समाचार वाचन से छात्र-छात्राओं को बहुत ही जानकारी होती थी। वेलोग अपने आस-पास की राजनीतिक, सामाजिक,आर्थिक तथा अन्य सभी गतिविधियों से परिचित होते थे। 15 अगस्त और 26 जनवरी केआने के पहले विद्यालय के छात्र-छात्राओं को व्यायाम तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम की खूब तैयारी करायी जाती थी। व्यायाम तथा पीटी० कराने में दो शिक्षक श्री सच्चिदानन्द किया तथा श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहा जी की बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी।खेल कूद से सम्बन्धित कार्य
 तथा लडकों को प्रशिक्षण श्री ललित कुमार पाण्डेयजी पूरी मेहनत से करते थे ।वे लोग कड़ी मेहनत करके लडकों को तैयार कराते थे। हम सभी शिक्षक उनका सहयोग करते थे।प्रत्येक शनिवार को भी ये लोग व्यायाम तथा खेल कराते थे। इन वरिष्ठ शिक्षकों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विद्यालय की ये अच्छी परम्पराएँ मुझे कहीं अन्य विद्यालयों में देखनेको नहीं मिली।सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु मैं भी सक्रिय रूप से भाग लेता था। कई बार संस्कृत के पद्यों का छात्र-छात्राओं से सस्वर वाचन कराता था,जो कि सुनने में बहुत ही अच्छा लगता था।मुझे याद है कि मैंने एक बार पूर्ण रूप से अपने नेतृत्व में छात्रों को अंधेर नगरी चौपट राजा नाटक को तैयार कराया था तथा 15 अगस्त के शुभ अवसर पर सफलतापूर्वक मंचन भी कराया था। सांस्कृतिक कार्यक्रम में विद्यालय के दो शिक्षक  एहसान अहमद तथा मोहम्मद आजम भी प्रायः मधुर गीत और शायरी सुनाया करते थे,जिनको सुनने के बाद मन आनन्दित हो जाता था।प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को विद्यालय के संस्थापक सचिव स्वर्गीय श्री रामाशीष वर्मा जो की पुण्यतिथ मनायी जाती है।उस दिन उनके वंशज श्री केशववर्माजी,श्री मुन्ना वर्माजी तथा वर्मा परिवार के अन्य सदस्यों के द्वारा खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन कराया जाता था। दूर-दूर से खेल की टीमें आती थी।लोगों का खूब मनोरंजन होता था। साथ ही विद्यालय परिवार के सभी शिक्षकों,शिक्षकेत्तर कर्मचारियों तथा छात्र-छात्राओं को पुस्तिका या कलम दिया जाता था।आस-पास के गरीब लोगों को कम्बल का वितरण किया जाता था। इतना बड़ा त्याग मैंने जीवन में पहली बार देखा था एवं मुझे यह जीवन भर प्रेरणाश्रोत बना रहेगा। इस कार्य के लिए मेरे तरफ से वर्मा परिवार को साधुवाद तथा कोटि -कोटि नमन।
                गणित के शिक्षक श्री लक्षाण पाण्डेयजी, हिन्दी के शिक्षक श्री सच्चिदानन्द मिश्राजी, समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री रमेश सिंहजी अपना अनुभव बाँटते थे।वे अवकाश की घण्टी में बहुत सारी अच्छी कहानियाँ तथा प्रसंग सुनाया करते थे,जिससे हमें बहुत सीख मिलती थी। अंग्रेजी के शिक्षक श्री सुस्तकमीन अंसारी तथा विज्ञान के शिक्षक श्री वीरेन्द्र सिंह भी अपने अनुभव तथा अच्छी बातें बताते थे,जिनसे हमें प्रेरणा मिलती थी। ये सभी बीच-बीच में हंसाने वाले चुटकुले भी कहा करते थे, जिससे हम सभी उदासमन को काफी तसल्ली मिलती थी। सामाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री चन्द्रप्रकाश प्रसादजी तथा सोहेल अहमदजी, शारीरिक शिक्षक श्री कुबेरनाथ सिंहजी, उर्दू और फारसी के शिक्षक श्री एहसान अहमदजी तथा श्री म० आजमजी और विज्ञान के शिक्षक श्री रवीन्द्र वर्मा जी ये सभी हमारे समान उम्र के थे। इनसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर तथा विषय से सम्बन्धित भी अवकाश को घण्टो में चर्चाएँ चलती थी। सभी सौहार्द पूर्ण वातावरण में अपना विचार व्यक्त करते थे। शारीरिक शिक्षक श्री कुबेर नाथ सिंहजी हमलोगों के बीच एक मनोरंजन के पात्र थे,क्योंकि वे चिढते बहुत थे,हलाँकि थोड़ी देर में ही वे प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण बातें करने लगते थे। हम सभी प्रायः मनोरंजन हेतु उनको चिढ़ाते रहते थे। वे बच्चों को व्यायाम पूरी लगन तथा मेहनत से कराते थे तथा खेल भी करवाते थे। इसके अलावे वे हिन्दी की कक्षा भी लेते थे। विद्यालय के लिपिक श्री शिवजी सिंह तथा चपरासी श्री अदालत सिंह हमेशा अपने कार्यो में व्यस्त रहते थे। वे लोग व्यस्तता के दिनों में अतिरिक्त भी मेहनत करते थे। श्री अदालत सिंह विद्यालयमें रहकर रात्रि प्रहरी का भी काम करते थे।समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहाजी हमें अपना व्यवहारिक अनुभव बताते थे तथा मुझे स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने के लिए प्रेरित करते रहते थे।वे अपने विषय के साथ-साथ संस्कृत विषय भी पूरी लगन और श्रद्धा से पढ़ाते थे। उनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिला।प्रधानाध्यापक श्री ललित कुमार पाण्डेयजी से भी हमें बहुत सहयोग मिला,वे बहुत ही सहनशील व्यक्ति थे।वे लोगों के क्रोधपूर्ण बातों को भी हँसीपूर्वक टाल देते थे। विद्यालय छोड़ने के समय कागजी कार्रवाई में मुझे बहुत सहयोग मिला।उनके अधीन मैं बहुत अधिक दिनों तक कार्य किया। वे विद्यालय को आदर्श पूर्ण तरीके से चलाने का प्रयाश करते थे। उनका यह स्वभाव मुझे विशेष रूप से पसन्द था।मेरे जीवन पर विद्यालय का अमिट छाप पड़ा।इस विद्यालय के माध्यम से मुझे बहुत कुछ सीखनेको मिला तथा अनुभव भी प्राप्त हुआ।एक तरह से यह विद्यालय मेरी तपोस्थली थी,जहाँ कम वेतन पर अधिक कार्य कर एक आदर्श स्थापित करना था। इसके लिए मैंने भरपूर प्रयास किया और इस काम में मैं कहाँ तक सफल हो सका,यह मुझे मालूम नहीं।मेरा सही मूल्यांकन तो उस समय के शिक्षक तथा छात्र ही कर पायेंगे। आज मैं अपनों से दूर, पहाड़ और घने जंगलों के बीच मैं यह सोचकर विचलित हो जाता हूँ कि काश वहाँ यदि सम्मानजनक वेतन मिला होता तो वहाँ के छात्र-छात्राओं के बौद्धिक विकास में अपना मामूली-सा योगदान दे पाता तथा मैं भी आनन्दपूर्वक अपने कर्तव्य के द्वारा स्वयं को सन्तुष्ट कर पाता।

मेरा विवाह

 

                                                मेरा विवाह



प्रवेशिकोत्तर परीक्षा में सफल होने के बाद मैंने अपना शक्षा निर्धारित कर लिया था।तदनुसार मैंने स्नातक में दाखिला ले लिया। क्योंकि मुझे अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए स्नातक करना बहुत जरूरी था। मेरा विचार था कि मैं अपना लक्ष्य प्राप्त करने के बाद ही शादी करूँगा, परन्तु विधि का विधान दूसरा ही था।  मेरे घर वाले मेरी शादी तुरंत ही करना चाहते थे,क्योंकि मेरी माँ अकेली ही थी। घर का सारा धंधा उसे ही देखना पड़ता था। इसलिए वह मेरी शादी करके अपना बोझ हल्का करना चाहती थी। एक और कारण था,जो मेरे जीवन को बहुत ही प्रभावित किया उस समय में बहुत ही धार्मिक हो चला था। मैं प्राय: गायत्री यज्ञ में शामिल हुआ करता था।  साधुओं की संगति में रहता था तथा कभी-कभी बैराग्य की बातें करता था। इसके साथ ही मैंने  एक गायत्री यज्ञ में गायत्री मन्त्र का दीक्षा के लिया और उपनयन संस्कार भी करा लिया। यह काम ग्राम मोनलापुर, थाना-बसन्तपुर जिला-सिवान में दिनांक 19 जनवरी 1945 हुआ था। यह काम करने वाले ब्राह्मण शांतिकुंज हरिद्वार के थे। हालांकि मेरे घर में उपनयन संस्कार होता था पर वह विवाह के समय होता था जो मेरा दूष्ट में शाश्त्र के विरुद्ध था। इसलिए मैने अपना उपनयन संस्कार करा लिया क्योंकि मैं ने सहयोचा था कि चलकर मुझे वेदोंका अध्ययन करना है जिसके लिए मुझे उपन्यव सुस्वर जरूरी था।  मेरे इस कार्य से मेरे घर के लोग बहुत नाराज हुए। और सोचने लगे कि मैं कहीं वैराग्य न ले लूँ। जिससे घर के लोग मेरी शादी जल्द ही करू देना चाहते थे। और मेरी शादी की बात तुरन्त ही शुरू हो गयी। मेरी शादी मशरख होनी तय हुई। इसमे अगुआ मेरे फूफा जो वहीं चैन पुर के रहने वाले थे।मेरी माँ ने शादी के लिए हाँ भर दी।मैं बहुत मुश्किल में पड़ गया। साथ ही  कोई तरीका खोजने लगा कि मेरी शादी किसी भी प्रकार न हो । मेरी बुआ मुझे लड़की दिखाने के लिए मशरख बुला ले गयी !मैंने उस लड़की को देखा।शाम के चारबजे का समय था वह वह पास ही के एक स्कूल से पढ़कर अपने घर जा रही थी। उसका उम्र बहुत ही कम था। पता करने पर यह मालूम हुआ कि वह छठी कक्षा में पढ़ती है तथा उसका मिता रिक्सा चलाता है।इस बात को जानकर बहुत ग्लानि हुयी कि इतनी कम उम्र में अपनी लड़की की शादी करना चाहते हैं। मुझे पास ही के एक पान की दुकान पर बैठाया गया। वहाँ कुछ लोग मुझे शादी करने के लिए दबा डालने लगे। पूछने लगे कि दहेज के रूप में क्या लेना है को बतलाओ मैने शादी से साफ इन्कार कर दिया। कुछ देर बाद उस लड़का माता आयी और कुछ बातें पूछी, मैंने जबाब दिया पर शादी से विल्कुल इन्कार कर दिया। मैंने सोचा कि ऐसी संस्कृति वाले घर में मैं कभी भी शादी नहीं करूंगा।मैं घर आकर शादी से बिल्कुल इन्कार कर दिया। बाद में मेरी माता भी उस लड़की को देखने गयी।लड़की के कम उम्र होने के चलते इन्कार कर गयी।यह सन् 1995 की बात है।
         दूसरी बार मेरे पास ही के गाँव खोडीपाकर में होनी तय हुई। उसे मेरे माता-पिता देखने गए।लड़की मेरे माता को पसंद तो नहीं आई पर पिताजी उसे पसंद कर लिए। दहेज के लिए भी तय-तमान हो गया। यह शादी न हो इसके लिए मैंने एक चाल चली।मैं अपने छात्रों के माध्यम से लड़की के गांव में यह अफवाह फैला दिया कि लड़का की माँ बहुत क्रोधी औरत है और थोड़ी सी भी गलती सहन नहीं करती तथा लड़का क्षय रोग का मरीज है। बस इतनी सी बात हुई कि शादी रद्द हो गयी।हालांकि मुझे ऐसा काम नहीं करना चाहिए था बाद में मैंने अपनी गलती महसूस की लेकिन लक्ष्य को प्राप्त करने की मुझे इतनी चाहत थी कि मुझे ऐसा काम करना पड़ा लेकिन यह सब मैंने परमार्थ के लिए किया इसलिए मुझे पाप नहीं लगेगा। इसमें अगुआ श्री रामानन्द औझा थे। यह मई1996 की बात है। 
      तीसरी बार मेरी शादी दिसम्बर 1996 में मसरख के पास डुमरी छपिया नामक ग्राम में तय से हुई। जो अन्तत: होकर ही रही।इसमें अगुआ मेरे पास ही के एक व्यक्ति ध्रुप प्रसाद थे।उस लड़की की देखने  पहले मेरी माँ,भाई और बहन गये। वह मेरी माँ को पसन्द आ गयी।पुन: 1जनवरी 1997 को मेरे पिताजी सात-आठ लोगों के साथ उस लड़की को देखने गये । लड़की सब को पसन्द आ गयी। तिलक और शादी दोनों की तारीख तय हो गयीं। मैने इसका बहुत विरोध किया, लेकिन घर के लोग माने नहीं। इसके विरोध में मैं घर से कई-कई दिनों तक बाहर रहा। इसी क्रम में मैंने काशी की यात्रा की। काशी में सबसे पहले काल भैरव मन्दिर गया। उसके बाद काशी विश्वनाथ मन्दिर गया। भगवान के दर्शन और पूजन के बाद मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का भ्रमण किया। इसे देखकर मैं दंग रह गया |उसके बाद मैं उन आश्रमों की खोज करने का असफल प्रयास किया। जहाँ मैं रहकर संस्कृत अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकूँ। परन्तु यह संभव नहीं हो सका।मुझे घर लौटना पड़ा | अगर मुझे इस तरह का कोई आश्रम मिल जाता तो मैं घर नहीं लौटता।यह मैने सोच लिया था।बहुत विरोध के बावजूद भी मेरी शादी अन्ततः हो ही गयी। तिलक 7 मई 1997 को था।दहेज के रुप में मुझे 5000रु और कुछ स्टील के वर्तन मिले। मेरे घर के लोग बहुत नाराज हुए, क्योंकि उनलोगों की दृष्टि में

यह पर्याप्त नहीं था इस समय मेरे घर से करीब 10 किलोमीटर दूर खजुरी गांव मेरा रहने वाली मेरी बुआ श्रीमती देवझरी देवी मेरे पिताजी और मेरे घर के लोगों पर विशेष रूप से नाराज हुई, यहां तक कि खाना भी नहीं खाई।दहेज लौटा देने कि बात चलने लगी। इस बाबत मैं मेने कुछ भी नहीं बोला।इस समय मेरे पास दो स्थितियाँ थी। मैं सोच रहा था कि अभी ही सही मेरी शादी किसी तरहन हो, होक है। दूसरी बात में सोच रहा था कि लड़की वाले बहुत गरीब है और मेरा सौभाग्य है कि मेरी शादी एक गरीब की लड़की से हो रहा है।इससे एक गरीब लडकी का कल्याण हो रहा है। कम से कम मेरे जीवन से एक गरीब की लड़की का तो भला हो। पर मैने इसमय कुछ नहीं बोला इस समय दोनो पक्षों के लीच सुलह की कोई गुंजाईस नहीं थी ।मेरे तिलक में मेरे तरफ से मेरे गुरु श्री रामनारायण सिंहजी आमंत्रित थे। वे दहेत लिरोधी व्यक्ति थे।उन्होंने अपनी बातों के प्रभाव से दो पक्षों के बीच सुलह समझौता कराया और मेरे विवाह का रास्ता साफ हो गया।तिलक मेरे छात्रों ने अतिथि सत्कार में विशेष रूप से योगदान दिया साथ ही मेरे मित्रों ने भी बहुत बड़ा योगदान दिया मैं अपने मित्र श्री महेश शाह का उपकार तो मैं कभी नहीं भूलूंगा।
           14 मई 1997 बुधवार  को मेरी बारात शाम को करीब 5:00 बजे निकली। मेरी बारात  में दो गाड़ियाँ थी।एक छोटी सी बस और एक कार ।कार पर मै  अपने पिताजी और कुछ संबंधियों के साथ बैठा था। बस पर अन्य सभी सम्बन्धी तथा गाँव के लोग सवार थे। कुछ गाँव के लोग  साइकिल से गये।शाम 7ः30 बजे द्वार पूजा सम्पन्न हुआ। रिस्तेदारों के मनोरंजन के लिए विडियो बाँधा गया था। रात2ः00 बजे विवाह का कार्यक्रम शुरू हुआ और3.30 बजे समाप्त हुआ। 14 मई 1997 बुधवार की वह काली रात मेरे घर के लोगों के द्वारा ऐसा खिलवाड़ किया गया जो मेरे जीवन की दिशा को बदल दिया। वस्तुत: विवाह नाम की ऐसी घटना मेरे साथ घटी जो मेरे लिए नरक का द्वार खोल दिया। यही वह घटना है जहाँ से मेरी विकास रुक गयी तथा विफलता की मंजिलों की ओर मुड़ गयी। विवाह के बाद मेरे सामने वैसी परिस्थितियाँ सामने आयीं,जैसा कि विवाह से पहले मैंने अंदाजा लगाया था।

मेरा छात्र जीवन

 

मेरा छात्र जीवन


           जब मैं 6 वर्ष का एक भोला-बाला बालक था,तो मेरा नाम नामांकन  राजकीय मध्य विद्यालय कौडिया में सन् 1981 ईस्वी में हो गया,जो मेरे घर के ठीक पास ही है।मेरा एक चचेरा भाई विजय है,जिसके साथ में रोज विद्यालय जाता और खेला-कुदा करता था। मेरे माता-पिता तथा घर के अन्य लोग मुझे मुन्ना नाम से पुकारते थे।विद्यालय की उपस्थिति पंजी पर मेरा नाम संजय कुमार था।उस समय मैं बिल्कुल अबोध सा था। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मैं विद्यालय में उपस्थिति तक नहीं बोलता था,जिसके कारण मेरा नाम हर महीने कट जाता था और मेरे बाबा स्वर्गीय रामकृपाल प्रसाद जी हर महीने नाम लिखवा आते थे।अंत में मेरे वर्ग शिक्षक महोदय श्री राम बहादुर सिंह जीं ने मेरे नाम के साथ कुशवाहा जोड़ दिया,जिससे कि मैं अपना नाम पुकारे जाने पर पहचान सकूं तथा उपस्थिति बोल सकूं। यही नहीं प्रथम वर्ग के वार्षिक परीक्षा में मैं फेल भी हो गया था,परंतु मुझे याद नहीं कि  कैसे मेरा नामांकन पुनः दूसरे वर्ग में हो गया।इस वर्ग में भी मुझे संतोषजनक अंक प्राप्त हुआ तथा तीसरे वर्ग में प्रवेश कर गया। मैं अपने पास के इस स्कूल में सिर्फ तीसरे वर्ग तक ही पढ़ पाया। मेरे स्कूल के प्रधानाध्यापक श्री बलिराम सिंह जी थे। अन्य सहायक शिक्षकों को मैंने उनके उपनाम से ही जानता था- जैसे राय जी,शुक्ला जी इत्यादि। इन शिक्षकों के प्रभाव से ही मैं पुस्तक पढ़ना गिनती पहाड़ा इत्यादि सीख पाया था। मुझे याद है कि कुछ दिनों तक मेरे घर आकर एक निजी शिक्षक श्री भिखारी प्रसाद जी ने पढ़ाया,मैं इनसे विशेष रूप से डरता था। इनसे मैं बहुत कुछ सीखा।सन् 1984 ईस्वी में मैं अपने गांव से विदा ले लिया। मेरे पिताजी ने मुझे और मेरे भाइयों को माता के साथ हावड़ा पश्चिम बंगाल के शिवपुर नामक स्थान पर ले गए। वहां वे काम करते थे और वहीं मेरा जन्म स्थान था। वही मेरा नामांकन शीतल हिंदी विद्यालय में पुन- तीसरे वर्ग में हो गया।अब हम सब मैं और मेरे भाई पिताजी के कठोर नियंत्रण में रहने लगे।
             रोज ब्रह्म बेला में उठकर पढ़ना शौचादि कर्म से निवृत्त हो पढ़ना स्नान के बाद भोजन करना स्कूल जाना नित्य कार्य था। हम सब प्रतिदिन अपने माता पिता के चरण स्पर्श करते थे। मुझे याद नहीं कि यह सब हमने कैसे सीख लिया था ? मुझे याद है कि मैं प्रतिदिन बीरबल तथा विनोद इत्यादि कुछ मित्रों के साथ व्यायाम भी करने जाता था, जो एक निजी संस्थान द्वारा प्रत्येक शाम को कराया जाता था।हमलोग 77नम्बर गुलाम हुसैन सरदार लैन में रहते थे। मेरे पिताजी शिवपुर जूट मिल में लिपिक के पद पर कार्यरत थे। उस समय उनका कारखाना कभी-कभी बंद हो जाया करता था।जिससे हमारी आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो जाती थी। जब हम लोग वहां पर थे तब उनका कारखाना करीब 6 महीने तक बंद हो गया। हम लोगों का नामांकन एक स्कूल में होने के कारण  अपने प्रदेश नहीं आ सकते थे,क्योंकि इससे हमारी पढ़ाई चौपट हो जाती इस कारण हम लोगों को किसी तरह दयनीय आर्थिक परिस्थिति में वहां पर साल भर रहना पड़ा। दिसंबर 1984 में तीसरे वर्ग के वार्षिक परीक्षा में मैंने पूरे वर्ग में दूसरा स्थान प्राप्त किया।यहां के शिक्षकों के नाम तो मुझे याद नहीं। परंतु उन्होंने अपनी विद्वता से हमें बहुत ही प्रभावित किया। मेरा एक मित्र था जिसका नाम सुरेश था। हम दोनों एक ही साथ बेंच पर बैठते थे।स्कूल से छुट्टी होने पर एक ही समय घर जाते थे। हम दोनों एक आत्मा दो शरीर वाले हो गए थे।हम दोनों वार्तालाप के द्वारा एक दूसरे से ज्ञान का आदान-प्रदान किया करते थे। बचपन के उस मित्र को मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं तथा भगवान् से यही प्रार्थना करता हूं कि वह आज जहां भी हो सुखीपूर्वक रहे। मैं उसके आनंदमय जीवन की कामना करता हूं। सन् 1985 ईस्वी में हम लोग मैं और मेरे घर के सभी सदस्य अपने गांव लौट आए। यहां हमारा नामांकन बसंतपुर के कन्वेंट स्कूल शिशु विकास केंद्र मैं स्टैंडर्ड फोर्थ में हुआ यहां के शिक्षकों को भी मैं उनके उपनाम से ही जानता था।जैसे बड़े सर लंबे सर इत्यादि। साल भर इस इस स्कूल में पढ़ने के बाद में मेरा दाखिला आदर्श राजकीय मध्य विद्यालय, बसंतपुर में हो गया। मैं स्कूल में 3 वर्ष छठा सातवां आठवां वर्गों में पढा। इस स्कूल के विद्वान् शिक्षकों की अमिट छाप अभी भी हमारे जीवन पर है। जब मैं छठा वर्ग 'घ' में पढ़ता था,तो उस समय इस वर्ग के शिक्षक श्री रोशन सिंह जी थे,जो हम लोगों के गणित पढ़ाते थे।मुझे वह घटना याद है कि जब स्कूल में कोई शुल्क लगा था,तो मेरे पिताजी ने आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते,क्योंकि उस समय मेरे पिताजी का कारखाना बंद था, जिसके कारण शुल्क माफी के लिए एक आवेदन पत्र लिखकर दिया मैं श्री रोशन बाबू को आवेदन पत्र दिया।उन्होंने मुझे  प्रधानाध्यापक के पास जाने को कहा। मैं प्रधानाध्यापक के पास जाने से अक्सर कतराता था,क्योंकि प्रधानाध्यापक क्रोधी स्वभाव के थे, खैर उस समय मैं किसी तरह प्रधानाध्यापक के पास गया और आवेदन पत्र दिया उन्होंने वह आवेदन पत्र देखकर पिताजी को बुलाया। मैंने  पिताजी से यह स्थिति स्पष्ट कर दिया। पिताजी शर्मिंदा होने के चलते प्रधानाध्यापकजी के पास नहीं गए। किसी से पैसा लेकर उन्होंने मुझे दिया और मैं शुल्क जमा कर दिया। मुझे यह भी याद है कि छठे वर्ग की छमाही परीक्षा में अपने वर्ग के सभी खण्डों के सभी पाँच सौ  लड़कों में गणित में दूसरा स्थान प्राप्त किया था।उस समय मेरा बड़ा नाम हुआ था। वार्षिक परीक्षा में मैंने अपने वर्ग के पूरे सौ लड़कों में चौथा स्थान प्राप्त किया।सन् 1988 ईस्वी में में वर्ग सातवां 'घ' का विद्यार्थी था। उस समय मेरे वर्ग शिक्षक महोदय श्री राम नारायण सिंह थे। वे संस्कृत के शिक्षक थे।उन्होंने मेरे जीवन को काफी प्रभावित किया।ये आदर्श के प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने अपने उपदेशों के द्वारा मुझे मांस-मछली खाना छुड़ाया। इन्होंने एक बार मुझे तथा मेरे वर्ग के साथियों को वर्ग में देवताओं को चित्र के समक्ष शपथ दिलाई। वस्तुतः इन्होंने ही मेरे अंदर स्थित धार्मिक भावना को जगाया।यदि वे हमारे छात्र जीवन में नहीं आए होते तो आज मेरा जीवन दूसरी दिशा में होता। इन्होंने हमारे जीवन को जो दिशा दिया,उसके लिए मैं इनका आजीवन ऋणी रहूंगा। इनके ही मार्गदर्शन में मैं अपने वर्ग में तीसरा स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैं अष्टम 'क' का विद्यार्थी हो गया। इस वर्ग के वर्गशिक्षक श्री नंदकिशोर सिंह जी थे।
         तीन वर्षों तक इस विद्यालय में अध्ययन करने के बाद मैं इस स्कूल से बिदा ले लिया। इतने वर्षो में हमारे मित्रों में प्रमुख थे-सत्येंद्र सिंह,अमित कुमार कुशवाहा,शंकर शाह तथा महेश साह इत्यादि इतनी मित्रों के नाम आज तक याद है। इस विद्यालय में कुछ प्रमुख शिक्षकों का नाम गिनाना चाहता हूँ,जिन्होंने हमारे जीवन को प्रभावित किया इसमें सबसे पहले मैं इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री राजबल्लभ सिंह का नाम लेना चाहूंगा जिनके आदर्श जीवन से मैंने बहुत कुछ लिया। इसके अलावा श्री रोशन सिंह, श्री मिश्रा जी तथा श्री रमेश सिंह इत्यादि ने भी हमारे जीवन को काफी प्रभावित किया। सन् 1989 ईस्वी में मेरा नामांकन उच्च विद्यालय,बसंतपुर में नवम् वर्ग में हुआ ।इस वर्ग के शिक्षक श्री अजय श्रीवास्तव थे। मुझे याद है कि मैं पहली बार कक्षा में गया था तो इन्होंने हम छात्रों से प्रश्न किया था कि बादलो से भरे आकाश वाली रात गर्म क्यों होती है?इस प्रश्न का उत्तर हम छात्रों में से कोई नहीं दे पाया था। इसमें इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने हमें बहुत आच्छी तरह से समझाया,जिससे कि मुझे वर्ग में ही याद हो गया,परंतु उनके शिक्षण कार्य का यह ढंग आने वाले दिनों में नहीं रहा।
    प्रायः विद्यालय के शिक्षकों की यह आदत बन गई थी कि जब किसी विषय की घंटी लगती थी तो वह या तो 15:20 मिनट देर से आते थे अथवा कोई बहाना कर घंटी नहीं करते थे। कभी-कभी वह घंटी करते सो अपवाद ही है। इसके अलावे कुछ ऐसे भी शिक्षक थे, जो घंटी करने आते तो वह पाठ्यक्रम की बात न पढ़ा कर इधर-उधर से बातें करके पूरी घंटी ही बिता देते थे। इसके अलावा मामूली सा फीस भी वसूली होता था,तो इस स्कूल को बंद कर दिया जाता था। हलांकि फीस वसूलने का काम सिर्फ 1 घंटे में ही किया जा सकता था। कभी-कभी यह स्कूल समय से पहले ही बंद हो जाया करता था। इसके अलावा इस स्कूल की सबसे खराब स्थिति यह थी कि स्कूल में तीन बार परीक्षाएं आयोजित की जाती थी,जो करीब डेढ़ महीने तक चलते थे क्योंकि पहले आंठवीं कक्षा की परीक्षा होती थी,तब नौवीं कक्षा की और तब दसवीं कक्षा की । इस तरह एक परीक्षा लेने में करीब-डेढ़ महीने लग जाते थे। रही सही पढ़ाई की कमर इन परीक्षाओं ने ही तोड़ दी थी। इसके अलावा राजनीति भी कभी-कभी हमारी पढ़ाई में हस्तक्षेप करती थी।जब मैं नवम् वर्ग में था। तब उस समय दिल्ली की गद्दी पर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी। इनकी सरकार नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण का कोटा बनाना चाहती थी। जिसका विरोध सारे भारतवर्ष में हुआ। इस विरोध प्रदर्शन में कालेज तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों का महत्वपूर्ण योगदान था,क्योंकि वे अधिकतर संपन्न वर्ग से आते थे। इस विरोध प्रदर्शन पर नियंत्रण पाने हेतु सरकार को करीब दो-तीन महीने तक अगस्त,सितंबर तथा अक्टूबर में स्कूल को बंद करना पड़ा। इसके अलावा दशम वर्ग में शिक्षकों के हड़ताल ने तो हमारी पढ़ाई ही चौपट कर दी। प्रायः छात्रों को अपनी पढ़ाई के लिए या तो स्वाध्याय पर आश्रित रहना पड़ता था अथवा ट्यूशन पर और ट्यूशन पढ़ाने वाले में सबसे आगे इसी हाई स्कूल के शिक्षक ही थे,जो अच्छे फीस पर छात्रों को पढ़ाया करते थे।वे शिक्षक विद्वान् थे पर अपनी विद्वता का उपयोग ट्यूशन के अलावे कभी स्कूल में नहीं किया। प्रायः हम और हमारे जैसे छात्रों को यह सपना ही बनकर रह गया कि ये शिक्षक हमें पढ़ाने के लिए भी पढ़ाने के लिए भी विद्वता का उपयोग करते। इन शिक्षकों के पास प्रायः संपन्न वर्ग के ही  लड़के ट्यूशन पढ़ा करते थे। हम और हमारे जैसे छात्रों को उनके पास ट्यूशन करना एक सपना ही था। मैंने अपने पास ही के नीजी शिक्षक श्री मधुसूदन तिवारी जी के पास ट्यूशन किया। जो गणित के शिक्षक थे और हमारे जैसे छात्रों का एकमात्र सहारा थे। इनका फीस इन शिक्षकों की भांति नहीं था,जो छात्रों का शोषण करते थे। उनके निर्देशन में मैं गणित में तेज हुआ।प्रायः: जब स्कूल में घंटी खाली रहा करती तो सब लड़के जहां इधर-उधर की बातें करते थे,वहां मैं गणित बनाया करता था। 

मेरा कर्तव्य

 मेरा कर्तव्य


        संसार के सम्पूर्ण दृश्य और अदृश्य परमब्रह्म की माया है। सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में फल की इच्छा परमब्रह्म की माया का प्रथम बन्धन है। इसलिए मैं न तो इनका कभी ग्रहण किया है और न कभी करता हूँ। अत: मेरी प्रेरणा से प्रकृति द्वारा परम श्रद्धा एवं अदम्य उत्साह के साथ केवल कर्तव्य और स्वधर्म निर्वाह मात्र समझकर जो कुछ भी होता है वो सब परमब्रह्म के लिये होता है। इसलिए मेरी प्रेरणा से प्रकृति द्वारा उत्पन्न फल का वास्तविक अधिकारी स्वयं परमब्रह्म हैं क्योंकि परमब्रह्म की प्रेरणा से ही प्रकृति द्वारा इस देह रूपी शरीर का सृजन हुआ है।
        आसक्ति परमब्रह्म की माया का दूसरा बंधन है। मेरे सकाश से प्रकृति द्वारा जो कुछ भी किया जाता है उससे तो केवल परमब्रह्म की माया की उत्पत्ति होती है,जो सदैव परमब्रह्म को ही समर्पित होती है। इस संसार में मेरे लिये कोई भी ऐसा कर्म अथवा वस्तु नहीं है,जिसके बिना मैं नहीं रह सकता। आवशकता होने पर मेरी प्रेरणा से प्रकृति द्वारा बिना किसी उद्वेग या आक्रोश के किसी भी कर्म अथवा वस्तु को त्यागा जा सकता है। मैं यह नहीं चाहता कि कोई कर्म मेरी ही प्रेरणा से सम्पन्न हो क्योंकि जो कुछ भी हुआ है,जो कुछ भी हो रहा है अथवा जो कुछ भी होने वाला है,वह सब परमब्रह्म की माया है तथा जो कुछ भी इन्द्रियों द्वारा अनुभव हो रहा है वह सब मिथ्या है।केवल एक परमब्रह्म ही सत्य है।
       समस्त कर्मों में कर्त्तापन का अभिमान परमब्रह्म की माया का तीसरा बंधन है।मैं न कभी कर्त्तापन को न कर्मों को तथा न कर्म फलों के संयोग को ही रचता हूँ। किन्तु मेरे सकाश से परमब्रह्म के लिये गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं।
      न मैंने आज तक किसी त्याग का पालन किया है और न कभी पालन करता हूँ,परन्तु प्रभु की प्रेरणा से इस प्राकृतिक शरीर द्वारा अग्रकथित त्याग का पालन किया जाता है।
         निषिद्ध कर्मों यानि चोरी,व्यभिचार,झूठ,कपट,छल,जबरदूस्ती,हिंसा,अभक्ष्यभोजन,प्रमाद तथा शाश्त्र विरुद्ध
निषिद्ध कर्मों का सर्वथा त्याग अर्थात् अस्तेय का पालन करने के लिये मन,वचन और कर्म से न तो दूसरे के द्रव्य की
इच्छा करना तथा न अनधिकृत रूप से प्राप्त करना।ईश्वर शरणागति के पालन हेतु मन बचन व कर्म से ईश्वर के प्रति
समर्पित रहकर स्वधर्म का पालन करना।निष्कपटता और निश्छल भाव के पालन के लिये सदैव सजग रहना। मन, वाणी और शरीर द्वारा किसी से जबरदस्ती न करना।अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिये मन,वचन व कर्म से किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार का दुःख न देना।मधु,मांस-मछली,लहसुन-प्याज,बासी भोजन एवं नशीले पदार्थ,चाय, बीड़ी,सिगरेट और पान इत्यादि का सेवन न कर सात्विक आहार का पालन करना और अन्तःकरण की व्यर्थचेष्टाओं को न कर प्रमाद का त्याग करना इसके अलावे शाश्त्र के अनुसार ही किसी भी कर्म को करना।काम्य कर्मों का त्याग करने के लिये स्त्री,पुत्र और धन आदि प्रियवस्तुओं की प्राप्ति एवं रोग संकटादि की निवृत्ति के उद्देश्य से किये जाने वाले यज्ञ,दान,तप और उपासनादि सकाम कर्मों को हिंसा रहीत भाव से अपने स्वार्थ के लिये न करना।
         मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा एवं स्त्रीपुत्र और धनादि अनित्य पदार्थों के बढ़ने की इच्छा यानि तृष्णा का सर्वथा त्याग करना।स्वार्थ यानि अपने सुख के लिये किसी से भी धनादि पदार्थों को अथवा सेवा कराने की याचना करना एवं बिना याचना के दिये हुये पदार्थों को या की हुयी सेवा को स्वीकार करना तथा किसी प्रकार भी किसी से स्वार्थ सिद्ध करने की मन में इच्छा रखना इत्यादि जो भी स्वार्थ के लिये दूसरों से सेवा कराने के भाव हैं,उन सब का हिंसारहीत भावसे त्याग करना। ईश्वर की भक्ति, देवताओं के पूजन,माता-पितादि गुरुजनों की सेवा,यज्ञ, दान तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ निर्वाह एवं शरीर संबंधी खान-पान इत्यादि जितने कर्त्तव्य कर्म है,उन सब में आलस्य और कामनाओं का त्याग करना तथा ईश्वर के रूप गुण एवं उनके लीला में सदैव लीन रहना। इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों को क्षणभंगुर,नाशवान् और भक्ति में बाधक समझते हुए किसी भी वस्तु के लिये न तो प्रार्थना करना और न ही मन में उसकी इच्छा रखना।"मे ब्रह्म हूँ"-ऐसी भावना रखना।इसके अलावे,"भगवान तुम्हें आरोग्य करें","भगवान् तुम्हारा दुःख दूर करे","भगवान् तुम्हारी आयु बढ़ावे","भगवान तुम्हारा बुरा करें" इत्यादि सकाम कथनों का प्रयोग न कर निष्काम कथन "हरिॐ","जय शिव","जय श्री राम","राम-राम""जय सनातन",  इत्यादि का प्रयोग करना।
          साथ ही माता-पितादि गुरुजनों की सेवा के लिये निष्काम भाव से सदा तत्पर रहना। यज्ञ तथा अन्न, वस्त्र, विद्या और धनादि पदार्थों के दान द्वारा सम्पूर्ण जीवों को यथायोग्य सुख पहुँचाने के लिये मन,वाणी तथा शरीर से चेष्टारत रहना। अपने धर्म के पालन के लिये हर प्रकार से कष्टों का सहन करना तथा लाभ हानि को समान समझना। इसके साथ ही दुखों की प्राप्ति में उद्वेग रहीत,सुखों के प्राप्ति में स्पृहा रहीत एवं राग,भय एवं क्रोध से अलग रहना । सर्वत्र स्नेह रहीत हुआ शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त कर न प्रसन्न होना और न द्वेष करना।इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से समेटे रहना एवं अपने आप जो कुछ आ प्राप्त हो उसी में सन्तुष्ट रहना। हर्ष शोकादि द्वन्द्व से अतीत हुआ इर्ष्या से रहीत हो सिद्धि और असिद्धि को समान समझना तथा किसी की आकांक्षा न करना।
           संसार के सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में ‘यह मेरा है‘ और ‘मैं कत्ता हूँ' यानि ममता का भाव कभी नहीं रखना और न ही उनसे संबंधित विषयों का चिन्तन करना यानि आसक्ति से सर्वथा रहीत होना विषयासक्त मनुष्यों में रहकर हास्य,विलास, प्रमाद, निन्दा, विषय भोग और व्यर्थ वार्तादि में अपने अमूल्य समय का एक क्षण भी नहीं बिताना। सर्वत्र ब्रह्म का अनुभव करते हुए अपने में  ब्रह्मत्व की भावना भर केवल भगवदार्थ कर्म करना जिससे ब्रह्ममय जगत् का कल्याण हो सके।
            संसार के सम्पूर्ण पदार्थ माया के कार्य होने से सर्वथा अनित्य है और ब्रह्म ही सर्वत्र समभाव से परिपूर्ण हैं ऐसा दृढ़निश्चय कर शरीर सहीत संसार के सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में सूक्ष्म वासना का सर्वथा अभाव हो जाना अर्थात् अन्तःकरण में उनके चित्रों का संस्कार रूप से भी न रहना एवं शरीर में अहंभाव का सर्वथा अभाव होकर मन, वाणी और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्त्तापन का अभिमान लेश मात्र भी न रहना।यदि किसी काल में सांसारिक घटना हो भी जाय तो धैर्य से जरा भी विचलित न होनाऔर सभी कर्मों के फल कामना का परमात्मा के लिये ही त्याग करना।सब भूतों में द्वेष भाव से रहीत;स्वार्थ रहीत,सबका प्रेमी,ममता रहीत,अहंकार रहीत,सुख-दुःख की प्राप्ति में सम और क्षमावान् अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देनेवाला,ध्यान योग में युक्त, निरन्तर लाभ-हानि में सन्तुष्ट, मन और इन्द्रियों सहीत शरीर को वश में किये हुये, परमात्मा में दृढ निश्चय वाला, परमात्मा में अर्पण किये हुये मन बुद्धि वाला, किसी भी जीव को उद्वेग न देनेवाला, स्वयं किसी जीव से उद्वेग को नहीं प्राप्त होने वाला, हर्ष से रहीत, दुसरों के उन्नति को देखकर होने वाले संताप से रहीत, भय और उद्वेगादिकों से रहीत, आकांक्षा से रहीत सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जलमृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि यानि बाहर की शुद्धि वाला,अन्तःकरण से स्वच्छ हो राग, द्वेष और कपट आदि विकारों से रहीत अर्थात भीतर की शुद्धि वाला,जिस काम के लिये आया था.उसको पूरा करने वाला यानि चतुर,पक्षपातरहीत,दुःखों से छुटा हुआ,सर्व आरम्भों का त्यागी अर्थात् मन,वाणी और शरीर द्वारा प्रारब्ध से होने वाले सम्पूर्ण स्वभाविक कर्मों में कर्त्तापन के अभिमान का त्यागी, शोच न करने वाला, शत्रु मित्र और मान-अपमान में समान रहने वाला,आसक्ति से रहीत,निन्दा-स्तुति को समान समझने वाला, ईश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला,जिस-किसी प्रकार से शरीर निर्वाह में सदा सन्तुष्ट,रहने के स्थान में ममता से रहीत, स्थिर बुद्धिवाला, भक्तिमान्,परमात्मा को परायण हुआ अर्थात् उसे परम आश्रय,परम गति,सबका आत्मरूप,सबसे परे, परम पूज्य समझने वाला विशुद्ध प्रेम से परमात्मा की प्राप्ति के लिये तत्पर,वेद,शाश्त्र,महात्मा और गुरुजनों तथा महेश्वर के वचनों में सदृश विश्वास यानि श्रद्धा वाला तथा निःस्वार्थ और निष्काम भाव से धर्म का रक्षक होना एवं किसी कार्य के लिये दृढ़ता पूर्वक आरूढ़ होना यानि आसन जमाकर मन और इन्द्रियों को वश में किये हुये बैठना। इसके अलावे यथोचित श्वास प्रश्वास गति का अवरोधन यानि प्राणायाम करते रहना।अपनी समस्त इन्द्रिन्यों को विषयवासना से विरत कर स्वस्ठ चित्त होना अर्थात संचित कुसंस्कारों एवं हेय प्रचलनों के आकर्षणों, दबावों को अस्वीकार कर सदा संघर्षशील रहना यानि प्रत्याहारका पालन करना।ईश्वर आत्मक्षमता, कर्त्तव्य कर्मों के दायित्व देवी देवताओं,मंत्रों,गुरुजनों एवं शाश्त्र पंथों में विश्वास कर धारणा करना।परमात्मा के अभीष्ट स्थिति का चिन्तन कर उनका ध्यान करना और लौकिकजीवन को पारलौकिक,परमार्थिक बना लेना। आत्मा को ईश्वर के अंश के रूप में देखना।संसार के प्रति विराट ब्रह्म की मान्यता रखना। आत्मसत्ता के स्वरूप,प्रयोजन एवं उपयोग के संबंध में तत्त्वदर्शी भूमिका का रहना यानि सदा-सर्वदा समाधि को अवस्था में ही रहना। इसके अलावे यथा संभव सम्पूर्ण धर्मों का आभाय,धर्म के निर्णय का विचार छोड़कर "क्या करना चाहिये था, और क्या नहीं करना चाहिरथा, क्या कर रहा हूँ और क्या नहीं कर रहा हूँ तथा क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।" का विचार घोड़कर सदा सर्वदा पूर्णरूपेन केवल परम प्रिय महाप्रभु परमब्रह्म परमपिता पर मेश्वर शिव के ही शरण में समर्पित रहना।

मेरा दर्शन

  मेरा दर्शन



        अपने बारे में स्वयं कुछ कहना मुश्किल है और दिलचस्प भी,क्योंकि अपनी बुराई या निन्दा करना स्वयं हमें बुरा मालूम होता है और अगर अपनी बड़ाई करें तो श्रोताओं को उसे सुनना नागवार मालूम होता है।
        जीवन-यापन काल में आड़े आने वाली कठिनाइयों को गाँठ में बाँधकर मैंने बहुत दिनों तक संजोये रक्खा तथा महीनों तक से उन गाँठो को भिन्न भिन्न प्रकार से खोलने का प्रयास किया, गाँठे खुलबुल कर पुन: गुलझठ बन जाती थीं और समयाभाव के कारण बहुत समय तक उलझी पड़ी रहती थीं। इस प्रकार कई वर्षों से मेरे अन्दर का दार्शनिक एक बेचैनी भरी घुटन का अनु -भव कर रहा था। इस घुटन के परिणाम स्वरूप मैंने जाना कि यह सारा संसार प्रभुमय है। इससृष्टि के कण-कण में प्रभु का वास है तथा इस सृष्टि की सम्पूर्ण क्रियायें प्रभु की इच्छा से ही होती है। अत: मेरे द्वारा जो कुछ भी हुआ है,वह प्रभु की इच्छा से ही हुआ है और चूँकि इस जगत् में मेरा कोई अस्तित्व भी नहीं है क्योंकि इस जगत में फेस मात्र प्रभु को छोड़कर अन्य कुछ है ही नहीं। इसलिए मैं अपने बारे कुछ कहना छोड़कर सिर्फ प्रभु में ध्यानावस्थित स्वयं के बारे में ही कुछ कहने जा रहा हूँ।
       मैं जिसे स्मरण करता हूँ,वह शिव है।जो मेरा स्मरण करता है,वह शिव है। मैं जिसका अनुभव करता हूँ,वह शिव है। मैं जिसके बारे में सोचता हूँ,वह शिव है। जो मेरे बारे में सोचता है,वह शिव है। मैं जिसे अध्ययन कराता हूँ,वह शिव है। मैं जिसे उपदेश देता हूँ,वह शिव है। जो मुझे उपदेश देता है,वह शिव है।जो मुझे नमन करता है,वह शिव है। जो मुझे नमन करता है वह शिव है। मैं जिसके बारे में पढ़ता-लिखता हूँ वह शिव है। मैं जिसके आदेश से कुछ करता हूँ,वह शिव है। मेरे आदेश से जो कुछ करता है वह शिव है। जो मेरा पालन करता है वह शिव है। मैं जिसे देखता हूँ,वह शिव है। जो मुझे देखता है,वह शिव है। मैं जिसे स्पर्श करता हूँ। मैं जिससे कुछ कहता हूँ,वह शिव है। जो मुझसे कुछ कहता है,वह शिव है।मैं जिससे कुछ सुनता हूँ,वह शिव है। जो मेरी निन्दा करता है,वह शिव है। जो मन ही मन अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मुझे गाली देता है,वह शिव है। जो मुझे रावण समझता है, वह शिव है। जो मुझे राम समझता है,शिव है। जो मुझे कंस समझता है,वह शिव है। जो मुझे कृष्ण समझता है,वह शिव है। जो मुझे ढ़ोंगी, अहंकारी,पापी और पाखंडी इत्यादि कुछ भी समझता है तथा शत्रुवत व्यवहार करता है,वह भी मेरा प्रभु शिव ही है।
और स्वयं मैं क्या हूँ यह भगवान् शिव ही जानते हैं।
         मुझे लोग संजय कहते हैं,परन्तु जब मेरा जन्म हुआ था,तब मेरा नाम संजय नहीं था,फिर गर्भ में और उसके पहले तो यह नाम हो ही कैसे सकता है?गर्भ में तो यह पत्ता भी नहीं था कि इसमें लड़का है लड़की। उस समय घरवाले इच्छा करते तो मेरा नाम संजय' नहीं रखकर 'धनंजय' रख सकते थे। तब आज अपने को धनंजय कहता। इससे यह सिद्ध हो गया कि मेरा नाम संजय नहीं है। जिस प्रकार कुमारी कन्याओं का विवाह हो जाने पर उन्हें उनके पति के नाम से ही सम्बोधित किया जाता है,उसी प्रकार भगवान शिव की शरणागति हो जाने कारण मैं अपने प्रभु विष्णु के नाम शैव से सम्बोधित किये जाने के योग्य हूँ।
        न मैंने आज तक कोई कर्म किया है,और न कभी करता हूँ,क्योंकि मैं शून्य हूँ और शून्य चूँकि ब्रह्म का पहला उन्मुग्ध रुप है,इसलिए मैं ब्रह्म और ब्रह्म में हूँ।मैं जिस स्वरूप में प्रस्तुत हूँ,वो स्वरूप मेरा नहीं,प्रभु का है। अतः इस स्वरूप से जो भी शब्द बोला जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु की प्रेरणा से बोला जाता है। इस आँख से जो कुछ भी देखा जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु द्वारा देखा जाता है। इस कान से जो कुछ भी सुना जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु द्वारा सुना जाता है। इस हाथ से जो कुछ भी किया जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु की प्रेरणा से किया जाता है।इसी प्रकार इस शरीर द्वारा सम्पन्न होने वाली अन्य सारी क्रियायें मेरे द्वारा नहीं,उस प्रभु के द्वारा की जाती है,जिसकी प्रेरणा से सदैव ही धर्म की रक्षा तथा दूसरों की सेवा होती है।
         मैं अपने प्रभु शिव की अराधना उसी प्रकार करता हूँ,जिस प्रकार स्वयं भगवान् विष्णु अपने प्रभु शिव की अराधना करते हैं। परन्तु मैं न तो प्रभु का भक्त हूँ और न अभक्त। न तो मेरा कोई अस्तित्व है और न ऐसा ही है कि मैं अस्तित्वहीन हूँ। मैं न आत्मा हूँ और न परमात्मा ! परन्तु ऐसा भी नहीं है कि मैं आत्मा नहीं हूँ और नहीं परमात्मा। मैं ज्ञानी भी नहीं और अज्ञानी भी नहीं। मैं धर्मी भी नहीं और अधर्मी भी नहीं और हे बान्धवों!मैं न देव हूँ,न गन्धर्व हूँ, न यक्ष हूँ और न दानव हूँ। मैं तो आपके बान्धव रूप से ही उत्पन्न हुआ हूँ।आपलोगों को इस विषय में और कुछ विचार नहीं करना चाहिए।
       मैं उनलोगों में नहीं हूँ,जो अपने को सबसे बड़ा भोक्ता,सभी सिद्धियों से युक्त,सर्वाचिक बलवान् तथा स्वयं ईश्वर का अवतार होने का दम्भ करते हैं। मेरा मानना है कि दम्भ में सत्त्व नहीं रहता एवं मिथ्या प्रदर्शन का कोई महत्त्व नहीं होता। यह छलावा है सत्य को झूठलाने का हास्यास्पद प्रयास।
      मैं एक सनातनी हिन्दू हूँ और एक सनातनी होने के नाते यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं वेदों को, उपनिषदों को, पुराणों को और उन सब वस्तुओं को मानता हूँ जो हिन्दू शाश्त्र के नाम से विख्यात है। मैं अन्य धर्मों के उन शास्त्रों को भी पवित्र मानता हूँ जिनमें सनातन सिद्धान्तों का  वर्णन है।मैं यह जानता हूँ कि वेदों, उपनिषदों और पुराणों के रहस्य इतने गंभीर है कि सामान्य बुद्धि से उनका वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता।मैं अवतारों और पुनर्जन्म में विश्वास रखता हूँ। मैं एक ओर यह धारणा करता हूँ कि कोई व्यक्ति मृत्यु के उपरान्त एक पल भी शून्य में नहीं रहता,उसे तुरन्त किसी गर्म में चला जाना होता है। दूसरी ओर मैं उनके अस्तित्व  की कल्पना पूर्वज, पितर अथवा किसी इतर योनि में चले जाने के रूप में भी करता हूँ।जिन्हें यह बात बिरोधाभासी और तर्क उत्पन्न करता है उनसे मुझे सिर्फ यही कहना है कि मानव जीवन की सूक्ष्मता का ज्ञान इतनी सहजता से नहीं समझाया जा सकता। यह सत्य है कि व्यक्ति मृत्यु के उपरान्त एक जीवन को त्याग दुसरे परिवेश में जन्म ले लेता है,किन्तु उनका सूक्ष्म अंश फिर भी पूर्व क्रम से जुड़ा ही रहता है या यों कहें उसका भौतिक स्वरूप तो किसी गर्भ के माध्यम से जन्म लेने को विवश होता है किन्तु उसका सूक्ष्म अंश ब्रह्मांड में रह  जाता है। इन्हीं सूक्ष्म तन्तुओं के कारण व्यक्ति अपने घरपरिवार का मोह त्याग नहीं पाता जिसकी प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति पुनर्जन्म की घटनाओं के माध्यम से होती है।
        मैं अपनी समझ के अनुसार ठीक वैदिक अर्थों में वर्णाश्रम धर्म को मानता हूँ।जिस जाति, वर्ण, एवं वर्ग को लेकर व्यक्ति गर्वित होता है और जिस द्विजत्व व शूद्रत्व को लेकर लम्बी-लम्बी चर्चाएँ,गोष्ठियाँ,तनाव एवं टकराव उत्पन्न हो रहे हैं वे न तो इस सनातन धर्म की कभी अंग रही हैं न कभी रहेंगी। इसका स्पष्ट मत है कि जन्म से कौन द्विज है और कौन हेय। सभी तो एक समान मल-मूत्र के मध्य होकर आ रहे हैं फिर इसमें इतनी अहंमन्यता क्यों? 
          मैं एक तरफ यह मानता हूँ कि देवता न तो काठ में रहते हैं न पत्थर में और न मिट्टी में रहते हैं। भाव में ही देवता का निवास है। भाव अगर सर्वत्र है तो देवता सर्वत्र हैं। दूसरी तरफ मैं मूर्तिपूजा को निषिद्ध नही मानता। क्योंकि मूर्तिपूजा करने वाले मूर्ति में ही अपने भगवान् का दर्शन करते हैं। मैं गोरक्षा को सनातन धर्म का अंग मानता हूँ और यह मानता हूँ कि गोरक्षा का मतलब सिर्फ गाय की रक्षा ही नहीं वरन गाय और गाय के नीचे की मूक सृष्टि की रक्षा है।
          मैं यह मानता हूँ कि इस सनातन धर्म तथा इसके अङ्गभूत गौ, ब्राह्मण, भक्त तथा सती नारियाँ जब संकटग्रस्त होकर परित्राण के लिए पुकार करती हैं, तब भगवान् श्री हरि अजन्मा होने पर भी अवतार धारण कर दुष्टों को दण्ड देकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।

        इसके साथ ही स्त्री-तलाक और विधवा विवाह को मैं बिल्कुल निषिद्ध मानता हूँ। कुलीन स्त्रियों के लिए सनातन धर्म में कहीं भी दूसरा पति बनाने का उपदेश नहीं दिया गया है। भाई-भाई के हिस्से का बँटवारा एक बार ही होता है, कन्यादान एकबार ही किया जाता है और मैंने दिया ऐसा संकल्प भी एक बार ही होता है। 

माहेश्वर

 माहेश्वर 


        मैं परम ब्रह्म शाम सदाशिव या भगवान महेश से संबंधित या उनसे जुड़ा हुआ तथा प्रिय होने के कारण माहेश्वर हूँ।जन्म समय तथा जन्म स्थान के आधार पर ज्योतिष विद्या द्वारा बनायी गयी जन्मकुण्डली से प्राप्त नक्षत्र मघा के पहले चरण के अक्षर-मा से यह स्पष्ट होता है कि मैं भगवान महेश से जुड़ा हुआ माहेश्वर ही हूँ। इस प्रकार मेरा जन्म नाम माहेश्वर ही है तथा यही सनातन नाम भी है। इसे आध्यात्मिक नाम भी कह सकते हैं। मैं माहेश्वर देह नहीं हूँ।अजर-अमर आत्मा हूँ अर्थात् न तो मेरा जन्म होता है और नहीं मृत्यु। मैं जन्म और मृत्यु से परे हूँ।


           मुझे लोग संजय कुमार कुशवाहा कहते हैं, परंतु जब मेरा जन्म हुआ था. तब मेरा नाम संजय कुमार कुशवाहा नहीं था, फिर गर्भ में तथा उसके पहले यह नाम कैसे हो सकता है ? उस समय घर वाले इच्छा करते तो मेरा नाम संजय कुमार कुशवाहा नहीं रखकर कोई दूसरा नाम रख सकते थे, तब मैं उसी नाम से जाना जाता। इससे यह सिद्ध होता है कि मेरा नाम संजय कुमार कुशवाहा नहीं है।यह नाम तो मेरे भौतिक शरीर का है। मेरा नाम तो माहेश्वर ही है। 
           पूर्व संचित कर्मों के बंधन से मुक्त होकर ज्ञान प्राप्त करने के लिए तथा पवित्र उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मैं श्रीमान् मुखदेव प्रसाद तथा श्रीमती सवारी देवी के पुत्र के रूप में विक्रम संवत 2031 में बसंत ऋतु के फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष के परम पवित्र उदयातिथि एकादशी तथा अस्त तिथि द्वादशी दिन सोमवार के रात्रि पौने नौ बजे  के  को जन्म ग्रहण किया था। मेरा जन्म स्थान पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में स्थित शिवपुर के काजीपाड़ा मोड़ के पास सत्तहत्तर नंबर गुलाम हुसैन सरदार लेन में है। इस प्रकार परम पवित्र आमलकी या रंगभरी एकादशी तिथि 
तथा गोविंद द्वादशी तिथि को मुझे भौतिक शरीर प्राप्त हुआ था।
          मेरे माध्यमिक परीक्षा के अभिलेख के अनुसार मेरा जन्म दिनांक 1 मार्च 1978 है। उस समय जन्म का पंजीकरण नहीं होता था ,इसलिए अभिभावक लोग निजी स्वार्थ के चलते या जन्म तिथि को देखने के आलस्य के चलते या अज्ञानता वश अपने मन से ही कोई जन्मतिथि नामांकन के समय में विद्यालय में दर्ज करा देते थे,जो कि वास्तविक जन्मतिथि से भिन्न होता था।
           जन्म के समय मेरे पिताजी हावड़ा के शिवपुर के जूट मिल में किरानी के पद पर कार्य करते थे और माता वहीं पर गृहिणी के रुप में रहती थी। मेरा मूल निवास स्थान बिहार के सिवान जिले के भगवानपुर प्रखण्ड के कौडियाँ ग्राम में राजकीय मध्य विद्यालय कौडियाँ के पास है। मेरे पितामह श्रीमान् रामकृपाल महतो एक किसान और भक्त व्यक्ति थे।वे घुमघुमकर भक्तिगीत गाते थे तथा खेती का कार्य करते थे।मेरे प्रपितामह महंगु महतो भी एक किसान और भक्त व्यक्ति थे। उनका मूल निवास स्थान भगवानपुर प्रखण्ड के अरुवाँ नामक गांव में था। उनका विवाह हमारे वर्तमान मूल निवास स्थान कौडियाँ में हुआ था और वह यहीं आकर ससुराल में बस गए थे ।इसी प्रकार मेरे मातामह श्रीमान् शिव मंगल प्रसाद बहुत बड़े भक्त थे और वे संन्यास लेकर साधु का जीवन व्यतीत करते थे। उनका घर बिहार के गोपालगंज जिले के बैकुंठपुर प्रखंड के महुआँ नामक ग्राम में था अभी भी उनके द्वारा बनाया गया बनवाया गया शिव मंदिर है।