अपनी ही बलि दे दी
सन् 2020 के अगस्त महीने की पांचवी तारीख को संचार माध्यमों के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ कि गरीबों के वास्तविक मसीहा धर्मेंद्र वर्मा उर्फ मुन्ना वर्मा जी का निधन हो गया है। इस घटना से मैं काफी मर्माहत और शोकग्रस्त हो गया,क्योंकि गरीबों के मसीहा तो बहुत लोग अपने को कहते फिरते हैं,परंतु वास्तविक रूप से गरीबों का मसीहा मैंने उनके व्यक्तित्व में अनुभव किया था। मैं दिनांक 5 दिसंबर 2006 से 6अगस्त 2010 तक तपी प्रसाद उच्च विद्यालय में कार्यरत था।उस अवधि में मैंने उनको काफी नजदीक से देखा था।प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को विद्यालय के संस्थापक सचिव स्वर्गीय श्री राम आशीष शर्मा जी के पुण्यतिथि के अवसर पर आसपास के बहुत सारे गरीब लोगों को उनके द्वारा कंबल का वितरण किया जाता था और विद्यालय के सभी छात्र छात्राओं को पुस्तिका एवं कलम का वितरण किया जाता था।यही नहीं विद्यालय के हम सभी कर्मचारियों को भी उनके द्वारा सम्मानित किया जाता था।इसके साथ ही इस अवसर पर लोगों के मनोरंजन के लिए खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन भी कराया जाता था। मैंने अपने जीवन में पहली बार इतना बड़ा त्याग और समर्पण करते हुए किसी व्यक्तित्व को देखा था और उन्हीं से प्रेरित होकर मैं अपने जीवन में प्यार और समर्पण की भावना को उतारने का प्रयास करता हूँ।वर्त्तमान समय तक बहुत सारे अमीर और अपने आप को गरीबों का मसीहा कहने वाले व्यक्तियों से मेरा संपर्क हुआ।मैंने सब में मुन्ना वर्मा जी के व्यक्तित्व को देखने का प्रयास किया,लेकिन कोई भी व्यक्तित्व उन पर खरा नहीं उतरा कविवर भूपति ने ठीक ही कहा है-
संपत्ति लखिकै कृपिन की, करौ न मन में भूल।
सुनबे ही होत है, ज्यौं गुलरी के फूल।।
बल्कि ऐसे लोग मिले जिनके पास अपार संपत्ति है पर चवन्नी पैसे का मदद गरीबों को नहीं करते वरन् उनका उल्टे शोषण करते हैं। ऐसे लोगों से मुझे सख्त घृणा होती है और मुझे कविवर वृंद का प्रसिद्ध दोहा स्मरण आता है-
स्वारथ के सबही सगे, बिन स्वारथ कोउ नाहिं।
सेवै पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ जाहिं।।
इस संसार में बिना स्वार्थ का कोई भी नहीं है,परंतु वर्मा जी के व्यक्तित्व में स्वार्थ की भावना मुझे बहुत कम ही देखने को मिली।संचार माध्यमों से मुझे पता चला कि भिट्टी पंचायत में स्थित उच्च विद्यालय में उस समय कोरोना महामारी से बचाव के लिए कोरोंटाईन सेंटर बनाया गया था,जहां उन्होंने बढ़-चढ़कर लोगों को सहयोग किया उन्हें सुविधाएं प्रदान की,यही नहीं आसपास के लोगों को भी उन्होंने बहुत ही सहयोग प्रदान किया।अपनी जान की परवाह किए बिना जनता की सेवा करते रहे और इसी दरमियान् कहीं वे कोरोनावायरस से संक्रमित हो गए और उनको नहीं बचाया जा सका और सन 2020 के 4 अगस्त को उन्होंने मौत को गले लगा लिया। लोगों की भलाई करते हुए वे एक तरह से गुमनाम शहीद हो गए। गुम नाम मैं इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि लोग समझते हैं कि देश की रक्षा करते हुए या युद्ध करते हुए जो शहीद होता है वही शहीद है,परंतु मेरा मानना है कि वर्मा जी ने भी कोरोना से बेहाल लोगों की सेवा करके एक तरह से एक सच्चे देशभक्त की तरह देश सेवा ही करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए।बहुत सारे लोग अलग-अलग तर्क देते हुए उन्हें शहीद नहीं मानेंगे,परंतु उन्हें मैं शहीद ही मानता हूँ ।इसलिए मैं उन्हें गुमनाम शहीद से संबोधित कर रहा हूँ। महान् संत कवि तुलसीदास ने कहा है कि दूसरों का परोपकार करते हुए जो शरीर का त्याग करता है, उसकी प्रशंसा संत लोग भी करते हैं-
परहित लागि तजइ जो देही ।
संतत संत प्रसंसहि तेही।।
और यही नहीं उन्होंने परोपकार को ही सबसे बड़ा धर्म बताया है-
परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।
देश की आजादी के बाद से लेकर आज तक भिट्ठी पंचायत का मुखिया वर्मा परिवार के किसी सदस्य को छोडकर दूसरा कोई भी नहीं हुआ।इसका कारण वर्मा परिवार की परोपकार की भावना तथा दीन-दुखियों की सेवा ही है। मुन्ना वर्मा जी ने अपने पूर्वजों के द्वारा बनाए गए धरोहर परोपकार की भावना तथा दीन-दुखियों की सेवा को अक्षुण रखा। उनके पितामह स्वर्गीय रामाशीष वर्मा द्वारा स्थापित किया गया तपी प्रसाद उच्च विद्यालय, प्राथमिक और मध्य विद्यालय,उनके पिता स्वर्गीय केशव वर्मा द्वारा स्थापित किया गया रामाशीष बालिका उच्च विद्यालय, वर्मा परिवार की अमर कृतियाँ है,जो सिवान जिला मुख्यालय से 32 किलोमीटर की दूर सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा का आलोक फैला रहे हैं। न जाने कितने प्रतिभा रूपी तारे यहां से निकलकर समाज रूपी आकाश में खिल रहे हैं। जिनकी गणना नहीं की जा सकती और यह अनंत समय तक क्षेत्र में शिक्षा की ज्योति को फैलाता रहेगा।ये सभी विद्यालय वर्मा परिवार के त्याग और परोपकार का प्रतीक है।वे अपनी कीर्ति से आज भी अमर है। वित्त,चित्त, जीवन और जीवनी- ये सभी नश्वर है पर जिसकी कीर्ति है,उसी को जिया या अमर कहते हैं-
चलं वित्तं चित्तं चले जीवित यौवने ।
चलालिमदं सर्वं कीर्तिर्यस्य स जीवति।।
धन की तो तीन ही गतियाँ होती हैं- दान,भोग और नाश। जो दान और भोग नहीं करता है, उसका धन नष्ट हो जाता है।परंतु वर्मा परिवार के लोग अपने धन का उपयोग परोपकार और दीन-दुखियों की सेवा में करके अमर हो गए। किसी ने ठीक ही कहा है-
दान भोग अरु नास जे रतन सु धन गति तीन ।
देत न भोगत तासु धन, होत नास में लीन।।
मुन्ना बाबू के पिता स्वर्गीय केशव वर्मा जी भी एक शांत और सौम्य व्यक्ति थे। मैं अक्सर उनसे मिला करता था।वे मुझे बहुत अच्छी बातें बताया करते थे। तपी प्रसाद उच्च विद्यालय के बगल में स्थित उनके द्वारा स्थापित रामाशीष वर्मा बालिका उच्च विद्यालय क्षेत्र के बालिकाओं में शिक्षा का आलोक फैला रहा है। मुन्ना वर्मा ने पूर्वजों के परोपकार और दानशीलता का अनुसरण किया। ठीक ही कहा गया है-
बाढै पूत पिता के धर्मा।
खेती उपजै अपने कर्मा।।
अंत में वर्मा परिवार के संबंध में कविवर रहीम का दोहा उद्धृत करना चाहूंगा-
जे गरीब पर हित करै ते रहीम बड़ लोग। कहाँ सुदामा बापुरो कृष्ण मिताई जोग।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें