मेरा विवाह
प्रवेशिकोत्तर परीक्षा में सफल होने के बाद मैंने अपना शक्षा निर्धारित कर लिया था।तदनुसार मैंने स्नातक में दाखिला ले लिया। क्योंकि मुझे अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए स्नातक करना बहुत जरूरी था। मेरा विचार था कि मैं अपना लक्ष्य प्राप्त करने के बाद ही शादी करूँगा, परन्तु विधि का विधान दूसरा ही था। मेरे घर वाले मेरी शादी तुरंत ही करना चाहते थे,क्योंकि मेरी माँ अकेली ही थी। घर का सारा धंधा उसे ही देखना पड़ता था। इसलिए वह मेरी शादी करके अपना बोझ हल्का करना चाहती थी। एक और कारण था,जो मेरे जीवन को बहुत ही प्रभावित किया उस समय में बहुत ही धार्मिक हो चला था। मैं प्राय: गायत्री यज्ञ में शामिल हुआ करता था। साधुओं की संगति में रहता था तथा कभी-कभी बैराग्य की बातें करता था। इसके साथ ही मैंने एक गायत्री यज्ञ में गायत्री मन्त्र का दीक्षा के लिया और उपनयन संस्कार भी करा लिया। यह काम ग्राम मोनलापुर, थाना-बसन्तपुर जिला-सिवान में दिनांक 19 जनवरी 1945 हुआ था। यह काम करने वाले ब्राह्मण शांतिकुंज हरिद्वार के थे। हालांकि मेरे घर में उपनयन संस्कार होता था पर वह विवाह के समय होता था जो मेरा दूष्ट में शाश्त्र के विरुद्ध था। इसलिए मैने अपना उपनयन संस्कार करा लिया क्योंकि मैं ने सहयोचा था कि चलकर मुझे वेदोंका अध्ययन करना है जिसके लिए मुझे उपन्यव सुस्वर जरूरी था। मेरे इस कार्य से मेरे घर के लोग बहुत नाराज हुए। और सोचने लगे कि मैं कहीं वैराग्य न ले लूँ। जिससे घर के लोग मेरी शादी जल्द ही करू देना चाहते थे। और मेरी शादी की बात तुरन्त ही शुरू हो गयी। मेरी शादी मशरख होनी तय हुई। इसमे अगुआ मेरे फूफा जो वहीं चैन पुर के रहने वाले थे।मेरी माँ ने शादी के लिए हाँ भर दी।मैं बहुत मुश्किल में पड़ गया। साथ ही कोई तरीका खोजने लगा कि मेरी शादी किसी भी प्रकार न हो । मेरी बुआ मुझे लड़की दिखाने के लिए मशरख बुला ले गयी !मैंने उस लड़की को देखा।शाम के चारबजे का समय था वह वह पास ही के एक स्कूल से पढ़कर अपने घर जा रही थी। उसका उम्र बहुत ही कम था। पता करने पर यह मालूम हुआ कि वह छठी कक्षा में पढ़ती है तथा उसका मिता रिक्सा चलाता है।इस बात को जानकर बहुत ग्लानि हुयी कि इतनी कम उम्र में अपनी लड़की की शादी करना चाहते हैं। मुझे पास ही के एक पान की दुकान पर बैठाया गया। वहाँ कुछ लोग मुझे शादी करने के लिए दबा डालने लगे। पूछने लगे कि दहेज के रूप में क्या लेना है को बतलाओ मैने शादी से साफ इन्कार कर दिया। कुछ देर बाद उस लड़का माता आयी और कुछ बातें पूछी, मैंने जबाब दिया पर शादी से विल्कुल इन्कार कर दिया। मैंने सोचा कि ऐसी संस्कृति वाले घर में मैं कभी भी शादी नहीं करूंगा।मैं घर आकर शादी से बिल्कुल इन्कार कर दिया। बाद में मेरी माता भी उस लड़की को देखने गयी।लड़की के कम उम्र होने के चलते इन्कार कर गयी।यह सन् 1995 की बात है।
दूसरी बार मेरे पास ही के गाँव खोडीपाकर में होनी तय हुई। उसे मेरे माता-पिता देखने गए।लड़की मेरे माता को पसंद तो नहीं आई पर पिताजी उसे पसंद कर लिए। दहेज के लिए भी तय-तमान हो गया। यह शादी न हो इसके लिए मैंने एक चाल चली।मैं अपने छात्रों के माध्यम से लड़की के गांव में यह अफवाह फैला दिया कि लड़का की माँ बहुत क्रोधी औरत है और थोड़ी सी भी गलती सहन नहीं करती तथा लड़का क्षय रोग का मरीज है। बस इतनी सी बात हुई कि शादी रद्द हो गयी।हालांकि मुझे ऐसा काम नहीं करना चाहिए था बाद में मैंने अपनी गलती महसूस की लेकिन लक्ष्य को प्राप्त करने की मुझे इतनी चाहत थी कि मुझे ऐसा काम करना पड़ा लेकिन यह सब मैंने परमार्थ के लिए किया इसलिए मुझे पाप नहीं लगेगा। इसमें अगुआ श्री रामानन्द औझा थे। यह मई1996 की बात है।
तीसरी बार मेरी शादी दिसम्बर 1996 में मसरख के पास डुमरी छपिया नामक ग्राम में तय से हुई। जो अन्तत: होकर ही रही।इसमें अगुआ मेरे पास ही के एक व्यक्ति ध्रुप प्रसाद थे।उस लड़की की देखने पहले मेरी माँ,भाई और बहन गये। वह मेरी माँ को पसन्द आ गयी।पुन: 1जनवरी 1997 को मेरे पिताजी सात-आठ लोगों के साथ उस लड़की को देखने गये । लड़की सब को पसन्द आ गयी। तिलक और शादी दोनों की तारीख तय हो गयीं। मैने इसका बहुत विरोध किया, लेकिन घर के लोग माने नहीं। इसके विरोध में मैं घर से कई-कई दिनों तक बाहर रहा। इसी क्रम में मैंने काशी की यात्रा की। काशी में सबसे पहले काल भैरव मन्दिर गया। उसके बाद काशी विश्वनाथ मन्दिर गया। भगवान के दर्शन और पूजन के बाद मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का भ्रमण किया। इसे देखकर मैं दंग रह गया |उसके बाद मैं उन आश्रमों की खोज करने का असफल प्रयास किया। जहाँ मैं रहकर संस्कृत अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकूँ। परन्तु यह संभव नहीं हो सका।मुझे घर लौटना पड़ा | अगर मुझे इस तरह का कोई आश्रम मिल जाता तो मैं घर नहीं लौटता।यह मैने सोच लिया था।बहुत विरोध के बावजूद भी मेरी शादी अन्ततः हो ही गयी। तिलक 7 मई 1997 को था।दहेज के रुप में मुझे 5000रु और कुछ स्टील के वर्तन मिले। मेरे घर के लोग बहुत नाराज हुए, क्योंकि उनलोगों की दृष्टि में
यह पर्याप्त नहीं था इस समय मेरे घर से करीब 10 किलोमीटर दूर खजुरी गांव मेरा रहने वाली मेरी बुआ श्रीमती देवझरी देवी मेरे पिताजी और मेरे घर के लोगों पर विशेष रूप से नाराज हुई, यहां तक कि खाना भी नहीं खाई।दहेज लौटा देने कि बात चलने लगी। इस बाबत मैं मेने कुछ भी नहीं बोला।इस समय मेरे पास दो स्थितियाँ थी। मैं सोच रहा था कि अभी ही सही मेरी शादी किसी तरहन हो, होक है। दूसरी बात में सोच रहा था कि लड़की वाले बहुत गरीब है और मेरा सौभाग्य है कि मेरी शादी एक गरीब की लड़की से हो रहा है।इससे एक गरीब लडकी का कल्याण हो रहा है। कम से कम मेरे जीवन से एक गरीब की लड़की का तो भला हो। पर मैने इसमय कुछ नहीं बोला इस समय दोनो पक्षों के लीच सुलह की कोई गुंजाईस नहीं थी ।मेरे तिलक में मेरे तरफ से मेरे गुरु श्री रामनारायण सिंहजी आमंत्रित थे। वे दहेत लिरोधी व्यक्ति थे।उन्होंने अपनी बातों के प्रभाव से दो पक्षों के बीच सुलह समझौता कराया और मेरे विवाह का रास्ता साफ हो गया।तिलक मेरे छात्रों ने अतिथि सत्कार में विशेष रूप से योगदान दिया साथ ही मेरे मित्रों ने भी बहुत बड़ा योगदान दिया मैं अपने मित्र श्री महेश शाह का उपकार तो मैं कभी नहीं भूलूंगा।
14 मई 1997 बुधवार को मेरी बारात शाम को करीब 5:00 बजे निकली। मेरी बारात में दो गाड़ियाँ थी।एक छोटी सी बस और एक कार ।कार पर मै अपने पिताजी और कुछ संबंधियों के साथ बैठा था। बस पर अन्य सभी सम्बन्धी तथा गाँव के लोग सवार थे। कुछ गाँव के लोग साइकिल से गये।शाम 7ः30 बजे द्वार पूजा सम्पन्न हुआ। रिस्तेदारों के मनोरंजन के लिए विडियो बाँधा गया था। रात2ः00 बजे विवाह का कार्यक्रम शुरू हुआ और3.30 बजे समाप्त हुआ। 14 मई 1997 बुधवार की वह काली रात मेरे घर के लोगों के द्वारा ऐसा खिलवाड़ किया गया जो मेरे जीवन की दिशा को बदल दिया। वस्तुत: विवाह नाम की ऐसी घटना मेरे साथ घटी जो मेरे लिए नरक का द्वार खोल दिया। यही वह घटना है जहाँ से मेरी विकास रुक गयी तथा विफलता की मंजिलों की ओर मुड़ गयी। विवाह के बाद मेरे सामने वैसी परिस्थितियाँ सामने आयीं,जैसा कि विवाह से पहले मैंने अंदाजा लगाया था।
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