आज मैं झारखण्ड राज्य के पूर्वीसिंहभूम जिले के चाकुलिया नगर पंचायत में स्थित मनोहरलाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक के पद पर कार्य करते हुए अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूँ,परन्तु मेरे इस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्टी,सिवान से होकर आता है। 5 दिसम्बर 2006 का वह सुनहला दिन,जिस दिन मैं प्रधानाध्यापक श्री मोतीलाल शर्मा के अधीन जिला परिषद माध्यमिक शिक्षक के पद पर योगदान किया था,मेरेलिए एक बहुत ही खुशी का दिन था,क्योंकि मेरे मन में एक उज्ज्वल भविष्य की कामना थी। मेरे योगदानके कुछ ही दिनों बाद मेरे पद की कोटि में ही छः अन्य शिक्षक भी योगदान दिए। इस विद्यालय में मैं 3 वर्ष8 महीने तक कार्यरत रहा। झारखण्ड लोक सेवा आयोग,राँची द्वारा सहायक शिक्षक के पद पर चयनित हो जाने के कारण मैं सम्बन्धित विद्यालय में योगदान करने हेतु 6 अगस्त 2010 को विद्यालय से पदमुक्त हो गया।
सिवान जिला मुख्यालय से करीब 32 कि. मी. दूर स्थित यह विद्यालय शिक्षा का आलोक फैलाकर जन-मानस को तृप्त कर रहा है। भिट्ठी के सम्मानित वर्मा परिवार की यह अमूल्य कीर्ति अनन्त समय तक बाल शिक्षा पिपासुओं की शिक्षा रूपी पिपासा को शान्त करता रहेगा। न जाने कितने रत्न यहाँ से निकले तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी आभा फैलाकर कीर्त्तिमान स्थापित कर रहे हैं,इसकी कोई गणना नहीं तथा भविष्य में भी ऐसा ही होता रहेगा। इसकार्य के लिए मैं विद्यालय की स्थापना में योगदानऔर त्याग करने वाले सभी महानुभावों का आदर सहित नमन करता हूँ। विशेष रूप से मिट्ठी के वर्मा परिवार के स्व० रामाशीष वर्मा जी को मैं कोटि-कोटि नमन करता हूँ और आशा करता हूँ कि विद्यालय प्रांगण में स्थित उनकी मूर्त्ति जन मानस के त्यागका प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।मैं विद्यालय में संस्कृत और हिन्दी विषय का नियमित अध्यापन कराता था। कभी-कभी गणित और विज्ञान की भी कक्षाएँ लिया करता था,क्योंकि इण्टरमीडिएटस्तर तक मैं गणित और विज्ञान विषय का अध्ययन किया था, जिसके कारण ऐसा संभव हो पाता था। मैंने तीन प्रधानाध्यापकों का कार्यकाल देखा।श्री मोतीलाल शर्मा जी के सेवा निवृत्त होने के बाद श्री सच्चिदा-जन्द्र मिश्र प्रधानाध्यापक बने तथा उनके सेवानिवृत्त होने के बाद श्री ललित कुमार पाण्डेय प्रधानाध्यापक बने।इन सभी के कार्यकाल में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। विद्यालय का वातावरण प्रायः शांतिपूर्ण रहता था। सभी शिक्षक प्रेमपूर्वकअध्यापन कार्य करते थे। विद्यालय के सभी शिक्षक समय पर पहुँचते थे। सुबह प्रार्थना के बाद रोजाना एक-एक शिक्षक के द्वारा समाचार -वाचन का कार्यक्रम होता था,जो मुझे बहुत ही अच्छा लगता था। मैं भी सप्ताह में एक दिन समाचार वाचन करता था। समाचार वाचन से छात्र-छात्राओं को बहुत ही जानकारी होती थी। वेलोग अपने आस-पास की राजनीतिक, सामाजिक,आर्थिक तथा अन्य सभी गतिविधियों से परिचित होते थे। 15 अगस्त और 26 जनवरी केआने के पहले विद्यालय के छात्र-छात्राओं को व्यायाम तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम की खूब तैयारी करायी जाती थी। व्यायाम तथा पीटी० कराने में दो शिक्षक श्री सच्चिदानन्द किया तथा श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहा जी की बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी।खेल कूद से सम्बन्धित कार्य
तथा लडकों को प्रशिक्षण श्री ललित कुमार पाण्डेयजी पूरी मेहनत से करते थे ।वे लोग कड़ी मेहनत करके लडकों को तैयार कराते थे। हम सभी शिक्षक उनका सहयोग करते थे।प्रत्येक शनिवार को भी ये लोग व्यायाम तथा खेल कराते थे। इन वरिष्ठ शिक्षकों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विद्यालय की ये अच्छी परम्पराएँ मुझे कहीं अन्य विद्यालयों में देखनेको नहीं मिली।सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु मैं भी सक्रिय रूप से भाग लेता था। कई बार संस्कृत के पद्यों का छात्र-छात्राओं से सस्वर वाचन कराता था,जो कि सुनने में बहुत ही अच्छा लगता था।मुझे याद है कि मैंने एक बार पूर्ण रूप से अपने नेतृत्व में छात्रों को अंधेर नगरी चौपट राजा नाटक को तैयार कराया था तथा 15 अगस्त के शुभ अवसर पर सफलतापूर्वक मंचन भी कराया था। सांस्कृतिक कार्यक्रम में विद्यालय के दो शिक्षक एहसान अहमद तथा मोहम्मद आजम भी प्रायः मधुर गीत और शायरी सुनाया करते थे,जिनको सुनने के बाद मन आनन्दित हो जाता था।प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को विद्यालय के संस्थापक सचिव स्वर्गीय श्री रामाशीष वर्मा जो की पुण्यतिथ मनायी जाती है।उस दिन उनके वंशज श्री केशववर्माजी,श्री मुन्ना वर्माजी तथा वर्मा परिवार के अन्य सदस्यों के द्वारा खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन कराया जाता था। दूर-दूर से खेल की टीमें आती थी।लोगों का खूब मनोरंजन होता था। साथ ही विद्यालय परिवार के सभी शिक्षकों,शिक्षकेत्तर कर्मचारियों तथा छात्र-छात्राओं को पुस्तिका या कलम दिया जाता था।आस-पास के गरीब लोगों को कम्बल का वितरण किया जाता था। इतना बड़ा त्याग मैंने जीवन में पहली बार देखा था एवं मुझे यह जीवन भर प्रेरणाश्रोत बना रहेगा। इस कार्य के लिए मेरे तरफ से वर्मा परिवार को साधुवाद तथा कोटि -कोटि नमन।
गणित के शिक्षक श्री लक्षाण पाण्डेयजी, हिन्दी के शिक्षक श्री सच्चिदानन्द मिश्राजी, समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री रमेश सिंहजी अपना अनुभव बाँटते थे।वे अवकाश की घण्टी में बहुत सारी अच्छी कहानियाँ तथा प्रसंग सुनाया करते थे,जिससे हमें बहुत सीख मिलती थी। अंग्रेजी के शिक्षक श्री सुस्तकमीन अंसारी तथा विज्ञान के शिक्षक श्री वीरेन्द्र सिंह भी अपने अनुभव तथा अच्छी बातें बताते थे,जिनसे हमें प्रेरणा मिलती थी। ये सभी बीच-बीच में हंसाने वाले चुटकुले भी कहा करते थे, जिससे हम सभी उदासमन को काफी तसल्ली मिलती थी। सामाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री चन्द्रप्रकाश प्रसादजी तथा सोहेल अहमदजी, शारीरिक शिक्षक श्री कुबेरनाथ सिंहजी, उर्दू और फारसी के शिक्षक श्री एहसान अहमदजी तथा श्री म० आजमजी और विज्ञान के शिक्षक श्री रवीन्द्र वर्मा जी ये सभी हमारे समान उम्र के थे। इनसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर तथा विषय से सम्बन्धित भी अवकाश को घण्टो में चर्चाएँ चलती थी। सभी सौहार्द पूर्ण वातावरण में अपना विचार व्यक्त करते थे। शारीरिक शिक्षक श्री कुबेर नाथ सिंहजी हमलोगों के बीच एक मनोरंजन के पात्र थे,क्योंकि वे चिढते बहुत थे,हलाँकि थोड़ी देर में ही वे प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण बातें करने लगते थे। हम सभी प्रायः मनोरंजन हेतु उनको चिढ़ाते रहते थे। वे बच्चों को व्यायाम पूरी लगन तथा मेहनत से कराते थे तथा खेल भी करवाते थे। इसके अलावे वे हिन्दी की कक्षा भी लेते थे। विद्यालय के लिपिक श्री शिवजी सिंह तथा चपरासी श्री अदालत सिंह हमेशा अपने कार्यो में व्यस्त रहते थे। वे लोग व्यस्तता के दिनों में अतिरिक्त भी मेहनत करते थे। श्री अदालत सिंह विद्यालयमें रहकर रात्रि प्रहरी का भी काम करते थे।समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहाजी हमें अपना व्यवहारिक अनुभव बताते थे तथा मुझे स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने के लिए प्रेरित करते रहते थे।वे अपने विषय के साथ-साथ संस्कृत विषय भी पूरी लगन और श्रद्धा से पढ़ाते थे। उनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिला।प्रधानाध्यापक श्री ललित कुमार पाण्डेयजी से भी हमें बहुत सहयोग मिला,वे बहुत ही सहनशील व्यक्ति थे।वे लोगों के क्रोधपूर्ण बातों को भी हँसीपूर्वक टाल देते थे। विद्यालय छोड़ने के समय कागजी कार्रवाई में मुझे बहुत सहयोग मिला।उनके अधीन मैं बहुत अधिक दिनों तक कार्य किया। वे विद्यालय को आदर्श पूर्ण तरीके से चलाने का प्रयाश करते थे। उनका यह स्वभाव मुझे विशेष रूप से पसन्द था।मेरे जीवन पर विद्यालय का अमिट छाप पड़ा।इस विद्यालय के माध्यम से मुझे बहुत कुछ सीखनेको मिला तथा अनुभव भी प्राप्त हुआ।एक तरह से यह विद्यालय मेरी तपोस्थली थी,जहाँ कम वेतन पर अधिक कार्य कर एक आदर्श स्थापित करना था। इसके लिए मैंने भरपूर प्रयास किया और इस काम में मैं कहाँ तक सफल हो सका,यह मुझे मालूम नहीं।मेरा सही मूल्यांकन तो उस समय के शिक्षक तथा छात्र ही कर पायेंगे। आज मैं अपनों से दूर, पहाड़ और घने जंगलों के बीच मैं यह सोचकर विचलित हो जाता हूँ कि काश वहाँ यदि सम्मानजनक वेतन मिला होता तो वहाँ के छात्र-छात्राओं के बौद्धिक विकास में अपना मामूली-सा योगदान दे पाता तथा मैं भी आनन्दपूर्वक अपने कर्तव्य के द्वारा स्वयं को सन्तुष्ट कर पाता।

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