रविवार, 29 मार्च 2026

मेरा दर्शन

  मेरा दर्शन



        अपने बारे में स्वयं कुछ कहना मुश्किल है और दिलचस्प भी,क्योंकि अपनी बुराई या निन्दा करना स्वयं हमें बुरा मालूम होता है और अगर अपनी बड़ाई करें तो श्रोताओं को उसे सुनना नागवार मालूम होता है।
        जीवन-यापन काल में आड़े आने वाली कठिनाइयों को गाँठ में बाँधकर मैंने बहुत दिनों तक संजोये रक्खा तथा महीनों तक से उन गाँठो को भिन्न भिन्न प्रकार से खोलने का प्रयास किया, गाँठे खुलबुल कर पुन: गुलझठ बन जाती थीं और समयाभाव के कारण बहुत समय तक उलझी पड़ी रहती थीं। इस प्रकार कई वर्षों से मेरे अन्दर का दार्शनिक एक बेचैनी भरी घुटन का अनु -भव कर रहा था। इस घुटन के परिणाम स्वरूप मैंने जाना कि यह सारा संसार प्रभुमय है। इससृष्टि के कण-कण में प्रभु का वास है तथा इस सृष्टि की सम्पूर्ण क्रियायें प्रभु की इच्छा से ही होती है। अत: मेरे द्वारा जो कुछ भी हुआ है,वह प्रभु की इच्छा से ही हुआ है और चूँकि इस जगत् में मेरा कोई अस्तित्व भी नहीं है क्योंकि इस जगत में फेस मात्र प्रभु को छोड़कर अन्य कुछ है ही नहीं। इसलिए मैं अपने बारे कुछ कहना छोड़कर सिर्फ प्रभु में ध्यानावस्थित स्वयं के बारे में ही कुछ कहने जा रहा हूँ।
       मैं जिसे स्मरण करता हूँ,वह शिव है।जो मेरा स्मरण करता है,वह शिव है। मैं जिसका अनुभव करता हूँ,वह शिव है। मैं जिसके बारे में सोचता हूँ,वह शिव है। जो मेरे बारे में सोचता है,वह शिव है। मैं जिसे अध्ययन कराता हूँ,वह शिव है। मैं जिसे उपदेश देता हूँ,वह शिव है। जो मुझे उपदेश देता है,वह शिव है।जो मुझे नमन करता है,वह शिव है। जो मुझे नमन करता है वह शिव है। मैं जिसके बारे में पढ़ता-लिखता हूँ वह शिव है। मैं जिसके आदेश से कुछ करता हूँ,वह शिव है। मेरे आदेश से जो कुछ करता है वह शिव है। जो मेरा पालन करता है वह शिव है। मैं जिसे देखता हूँ,वह शिव है। जो मुझे देखता है,वह शिव है। मैं जिसे स्पर्श करता हूँ। मैं जिससे कुछ कहता हूँ,वह शिव है। जो मुझसे कुछ कहता है,वह शिव है।मैं जिससे कुछ सुनता हूँ,वह शिव है। जो मेरी निन्दा करता है,वह शिव है। जो मन ही मन अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मुझे गाली देता है,वह शिव है। जो मुझे रावण समझता है, वह शिव है। जो मुझे राम समझता है,शिव है। जो मुझे कंस समझता है,वह शिव है। जो मुझे कृष्ण समझता है,वह शिव है। जो मुझे ढ़ोंगी, अहंकारी,पापी और पाखंडी इत्यादि कुछ भी समझता है तथा शत्रुवत व्यवहार करता है,वह भी मेरा प्रभु शिव ही है।
और स्वयं मैं क्या हूँ यह भगवान् शिव ही जानते हैं।
         मुझे लोग संजय कहते हैं,परन्तु जब मेरा जन्म हुआ था,तब मेरा नाम संजय नहीं था,फिर गर्भ में और उसके पहले तो यह नाम हो ही कैसे सकता है?गर्भ में तो यह पत्ता भी नहीं था कि इसमें लड़का है लड़की। उस समय घरवाले इच्छा करते तो मेरा नाम संजय' नहीं रखकर 'धनंजय' रख सकते थे। तब आज अपने को धनंजय कहता। इससे यह सिद्ध हो गया कि मेरा नाम संजय नहीं है। जिस प्रकार कुमारी कन्याओं का विवाह हो जाने पर उन्हें उनके पति के नाम से ही सम्बोधित किया जाता है,उसी प्रकार भगवान शिव की शरणागति हो जाने कारण मैं अपने प्रभु विष्णु के नाम शैव से सम्बोधित किये जाने के योग्य हूँ।
        न मैंने आज तक कोई कर्म किया है,और न कभी करता हूँ,क्योंकि मैं शून्य हूँ और शून्य चूँकि ब्रह्म का पहला उन्मुग्ध रुप है,इसलिए मैं ब्रह्म और ब्रह्म में हूँ।मैं जिस स्वरूप में प्रस्तुत हूँ,वो स्वरूप मेरा नहीं,प्रभु का है। अतः इस स्वरूप से जो भी शब्द बोला जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु की प्रेरणा से बोला जाता है। इस आँख से जो कुछ भी देखा जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु द्वारा देखा जाता है। इस कान से जो कुछ भी सुना जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु द्वारा सुना जाता है। इस हाथ से जो कुछ भी किया जाता है वो मेरे द्वारा नहीं प्रभु की प्रेरणा से किया जाता है।इसी प्रकार इस शरीर द्वारा सम्पन्न होने वाली अन्य सारी क्रियायें मेरे द्वारा नहीं,उस प्रभु के द्वारा की जाती है,जिसकी प्रेरणा से सदैव ही धर्म की रक्षा तथा दूसरों की सेवा होती है।
         मैं अपने प्रभु शिव की अराधना उसी प्रकार करता हूँ,जिस प्रकार स्वयं भगवान् विष्णु अपने प्रभु शिव की अराधना करते हैं। परन्तु मैं न तो प्रभु का भक्त हूँ और न अभक्त। न तो मेरा कोई अस्तित्व है और न ऐसा ही है कि मैं अस्तित्वहीन हूँ। मैं न आत्मा हूँ और न परमात्मा ! परन्तु ऐसा भी नहीं है कि मैं आत्मा नहीं हूँ और नहीं परमात्मा। मैं ज्ञानी भी नहीं और अज्ञानी भी नहीं। मैं धर्मी भी नहीं और अधर्मी भी नहीं और हे बान्धवों!मैं न देव हूँ,न गन्धर्व हूँ, न यक्ष हूँ और न दानव हूँ। मैं तो आपके बान्धव रूप से ही उत्पन्न हुआ हूँ।आपलोगों को इस विषय में और कुछ विचार नहीं करना चाहिए।
       मैं उनलोगों में नहीं हूँ,जो अपने को सबसे बड़ा भोक्ता,सभी सिद्धियों से युक्त,सर्वाचिक बलवान् तथा स्वयं ईश्वर का अवतार होने का दम्भ करते हैं। मेरा मानना है कि दम्भ में सत्त्व नहीं रहता एवं मिथ्या प्रदर्शन का कोई महत्त्व नहीं होता। यह छलावा है सत्य को झूठलाने का हास्यास्पद प्रयास।
      मैं एक सनातनी हिन्दू हूँ और एक सनातनी होने के नाते यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं वेदों को, उपनिषदों को, पुराणों को और उन सब वस्तुओं को मानता हूँ जो हिन्दू शाश्त्र के नाम से विख्यात है। मैं अन्य धर्मों के उन शास्त्रों को भी पवित्र मानता हूँ जिनमें सनातन सिद्धान्तों का  वर्णन है।मैं यह जानता हूँ कि वेदों, उपनिषदों और पुराणों के रहस्य इतने गंभीर है कि सामान्य बुद्धि से उनका वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता।मैं अवतारों और पुनर्जन्म में विश्वास रखता हूँ। मैं एक ओर यह धारणा करता हूँ कि कोई व्यक्ति मृत्यु के उपरान्त एक पल भी शून्य में नहीं रहता,उसे तुरन्त किसी गर्म में चला जाना होता है। दूसरी ओर मैं उनके अस्तित्व  की कल्पना पूर्वज, पितर अथवा किसी इतर योनि में चले जाने के रूप में भी करता हूँ।जिन्हें यह बात बिरोधाभासी और तर्क उत्पन्न करता है उनसे मुझे सिर्फ यही कहना है कि मानव जीवन की सूक्ष्मता का ज्ञान इतनी सहजता से नहीं समझाया जा सकता। यह सत्य है कि व्यक्ति मृत्यु के उपरान्त एक जीवन को त्याग दुसरे परिवेश में जन्म ले लेता है,किन्तु उनका सूक्ष्म अंश फिर भी पूर्व क्रम से जुड़ा ही रहता है या यों कहें उसका भौतिक स्वरूप तो किसी गर्भ के माध्यम से जन्म लेने को विवश होता है किन्तु उसका सूक्ष्म अंश ब्रह्मांड में रह  जाता है। इन्हीं सूक्ष्म तन्तुओं के कारण व्यक्ति अपने घरपरिवार का मोह त्याग नहीं पाता जिसकी प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति पुनर्जन्म की घटनाओं के माध्यम से होती है।
        मैं अपनी समझ के अनुसार ठीक वैदिक अर्थों में वर्णाश्रम धर्म को मानता हूँ।जिस जाति, वर्ण, एवं वर्ग को लेकर व्यक्ति गर्वित होता है और जिस द्विजत्व व शूद्रत्व को लेकर लम्बी-लम्बी चर्चाएँ,गोष्ठियाँ,तनाव एवं टकराव उत्पन्न हो रहे हैं वे न तो इस सनातन धर्म की कभी अंग रही हैं न कभी रहेंगी। इसका स्पष्ट मत है कि जन्म से कौन द्विज है और कौन हेय। सभी तो एक समान मल-मूत्र के मध्य होकर आ रहे हैं फिर इसमें इतनी अहंमन्यता क्यों? 
          मैं एक तरफ यह मानता हूँ कि देवता न तो काठ में रहते हैं न पत्थर में और न मिट्टी में रहते हैं। भाव में ही देवता का निवास है। भाव अगर सर्वत्र है तो देवता सर्वत्र हैं। दूसरी तरफ मैं मूर्तिपूजा को निषिद्ध नही मानता। क्योंकि मूर्तिपूजा करने वाले मूर्ति में ही अपने भगवान् का दर्शन करते हैं। मैं गोरक्षा को सनातन धर्म का अंग मानता हूँ और यह मानता हूँ कि गोरक्षा का मतलब सिर्फ गाय की रक्षा ही नहीं वरन गाय और गाय के नीचे की मूक सृष्टि की रक्षा है।
          मैं यह मानता हूँ कि इस सनातन धर्म तथा इसके अङ्गभूत गौ, ब्राह्मण, भक्त तथा सती नारियाँ जब संकटग्रस्त होकर परित्राण के लिए पुकार करती हैं, तब भगवान् श्री हरि अजन्मा होने पर भी अवतार धारण कर दुष्टों को दण्ड देकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।

        इसके साथ ही स्त्री-तलाक और विधवा विवाह को मैं बिल्कुल निषिद्ध मानता हूँ। कुलीन स्त्रियों के लिए सनातन धर्म में कहीं भी दूसरा पति बनाने का उपदेश नहीं दिया गया है। भाई-भाई के हिस्से का बँटवारा एक बार ही होता है, कन्यादान एकबार ही किया जाता है और मैंने दिया ऐसा संकल्प भी एक बार ही होता है। 

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