रविवार, 29 मार्च 2026

मेरा कर्तव्य

 मेरा कर्तव्य


        संसार के सम्पूर्ण दृश्य और अदृश्य परमब्रह्म की माया है। सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में फल की इच्छा परमब्रह्म की माया का प्रथम बन्धन है। इसलिए मैं न तो इनका कभी ग्रहण किया है और न कभी करता हूँ। अत: मेरी प्रेरणा से प्रकृति द्वारा परम श्रद्धा एवं अदम्य उत्साह के साथ केवल कर्तव्य और स्वधर्म निर्वाह मात्र समझकर जो कुछ भी होता है वो सब परमब्रह्म के लिये होता है। इसलिए मेरी प्रेरणा से प्रकृति द्वारा उत्पन्न फल का वास्तविक अधिकारी स्वयं परमब्रह्म हैं क्योंकि परमब्रह्म की प्रेरणा से ही प्रकृति द्वारा इस देह रूपी शरीर का सृजन हुआ है।
        आसक्ति परमब्रह्म की माया का दूसरा बंधन है। मेरे सकाश से प्रकृति द्वारा जो कुछ भी किया जाता है उससे तो केवल परमब्रह्म की माया की उत्पत्ति होती है,जो सदैव परमब्रह्म को ही समर्पित होती है। इस संसार में मेरे लिये कोई भी ऐसा कर्म अथवा वस्तु नहीं है,जिसके बिना मैं नहीं रह सकता। आवशकता होने पर मेरी प्रेरणा से प्रकृति द्वारा बिना किसी उद्वेग या आक्रोश के किसी भी कर्म अथवा वस्तु को त्यागा जा सकता है। मैं यह नहीं चाहता कि कोई कर्म मेरी ही प्रेरणा से सम्पन्न हो क्योंकि जो कुछ भी हुआ है,जो कुछ भी हो रहा है अथवा जो कुछ भी होने वाला है,वह सब परमब्रह्म की माया है तथा जो कुछ भी इन्द्रियों द्वारा अनुभव हो रहा है वह सब मिथ्या है।केवल एक परमब्रह्म ही सत्य है।
       समस्त कर्मों में कर्त्तापन का अभिमान परमब्रह्म की माया का तीसरा बंधन है।मैं न कभी कर्त्तापन को न कर्मों को तथा न कर्म फलों के संयोग को ही रचता हूँ। किन्तु मेरे सकाश से परमब्रह्म के लिये गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं।
      न मैंने आज तक किसी त्याग का पालन किया है और न कभी पालन करता हूँ,परन्तु प्रभु की प्रेरणा से इस प्राकृतिक शरीर द्वारा अग्रकथित त्याग का पालन किया जाता है।
         निषिद्ध कर्मों यानि चोरी,व्यभिचार,झूठ,कपट,छल,जबरदूस्ती,हिंसा,अभक्ष्यभोजन,प्रमाद तथा शाश्त्र विरुद्ध
निषिद्ध कर्मों का सर्वथा त्याग अर्थात् अस्तेय का पालन करने के लिये मन,वचन और कर्म से न तो दूसरे के द्रव्य की
इच्छा करना तथा न अनधिकृत रूप से प्राप्त करना।ईश्वर शरणागति के पालन हेतु मन बचन व कर्म से ईश्वर के प्रति
समर्पित रहकर स्वधर्म का पालन करना।निष्कपटता और निश्छल भाव के पालन के लिये सदैव सजग रहना। मन, वाणी और शरीर द्वारा किसी से जबरदस्ती न करना।अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिये मन,वचन व कर्म से किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार का दुःख न देना।मधु,मांस-मछली,लहसुन-प्याज,बासी भोजन एवं नशीले पदार्थ,चाय, बीड़ी,सिगरेट और पान इत्यादि का सेवन न कर सात्विक आहार का पालन करना और अन्तःकरण की व्यर्थचेष्टाओं को न कर प्रमाद का त्याग करना इसके अलावे शाश्त्र के अनुसार ही किसी भी कर्म को करना।काम्य कर्मों का त्याग करने के लिये स्त्री,पुत्र और धन आदि प्रियवस्तुओं की प्राप्ति एवं रोग संकटादि की निवृत्ति के उद्देश्य से किये जाने वाले यज्ञ,दान,तप और उपासनादि सकाम कर्मों को हिंसा रहीत भाव से अपने स्वार्थ के लिये न करना।
         मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा एवं स्त्रीपुत्र और धनादि अनित्य पदार्थों के बढ़ने की इच्छा यानि तृष्णा का सर्वथा त्याग करना।स्वार्थ यानि अपने सुख के लिये किसी से भी धनादि पदार्थों को अथवा सेवा कराने की याचना करना एवं बिना याचना के दिये हुये पदार्थों को या की हुयी सेवा को स्वीकार करना तथा किसी प्रकार भी किसी से स्वार्थ सिद्ध करने की मन में इच्छा रखना इत्यादि जो भी स्वार्थ के लिये दूसरों से सेवा कराने के भाव हैं,उन सब का हिंसारहीत भावसे त्याग करना। ईश्वर की भक्ति, देवताओं के पूजन,माता-पितादि गुरुजनों की सेवा,यज्ञ, दान तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ निर्वाह एवं शरीर संबंधी खान-पान इत्यादि जितने कर्त्तव्य कर्म है,उन सब में आलस्य और कामनाओं का त्याग करना तथा ईश्वर के रूप गुण एवं उनके लीला में सदैव लीन रहना। इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों को क्षणभंगुर,नाशवान् और भक्ति में बाधक समझते हुए किसी भी वस्तु के लिये न तो प्रार्थना करना और न ही मन में उसकी इच्छा रखना।"मे ब्रह्म हूँ"-ऐसी भावना रखना।इसके अलावे,"भगवान तुम्हें आरोग्य करें","भगवान् तुम्हारा दुःख दूर करे","भगवान् तुम्हारी आयु बढ़ावे","भगवान तुम्हारा बुरा करें" इत्यादि सकाम कथनों का प्रयोग न कर निष्काम कथन "हरिॐ","जय शिव","जय श्री राम","राम-राम""जय सनातन",  इत्यादि का प्रयोग करना।
          साथ ही माता-पितादि गुरुजनों की सेवा के लिये निष्काम भाव से सदा तत्पर रहना। यज्ञ तथा अन्न, वस्त्र, विद्या और धनादि पदार्थों के दान द्वारा सम्पूर्ण जीवों को यथायोग्य सुख पहुँचाने के लिये मन,वाणी तथा शरीर से चेष्टारत रहना। अपने धर्म के पालन के लिये हर प्रकार से कष्टों का सहन करना तथा लाभ हानि को समान समझना। इसके साथ ही दुखों की प्राप्ति में उद्वेग रहीत,सुखों के प्राप्ति में स्पृहा रहीत एवं राग,भय एवं क्रोध से अलग रहना । सर्वत्र स्नेह रहीत हुआ शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त कर न प्रसन्न होना और न द्वेष करना।इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से समेटे रहना एवं अपने आप जो कुछ आ प्राप्त हो उसी में सन्तुष्ट रहना। हर्ष शोकादि द्वन्द्व से अतीत हुआ इर्ष्या से रहीत हो सिद्धि और असिद्धि को समान समझना तथा किसी की आकांक्षा न करना।
           संसार के सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में ‘यह मेरा है‘ और ‘मैं कत्ता हूँ' यानि ममता का भाव कभी नहीं रखना और न ही उनसे संबंधित विषयों का चिन्तन करना यानि आसक्ति से सर्वथा रहीत होना विषयासक्त मनुष्यों में रहकर हास्य,विलास, प्रमाद, निन्दा, विषय भोग और व्यर्थ वार्तादि में अपने अमूल्य समय का एक क्षण भी नहीं बिताना। सर्वत्र ब्रह्म का अनुभव करते हुए अपने में  ब्रह्मत्व की भावना भर केवल भगवदार्थ कर्म करना जिससे ब्रह्ममय जगत् का कल्याण हो सके।
            संसार के सम्पूर्ण पदार्थ माया के कार्य होने से सर्वथा अनित्य है और ब्रह्म ही सर्वत्र समभाव से परिपूर्ण हैं ऐसा दृढ़निश्चय कर शरीर सहीत संसार के सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में सूक्ष्म वासना का सर्वथा अभाव हो जाना अर्थात् अन्तःकरण में उनके चित्रों का संस्कार रूप से भी न रहना एवं शरीर में अहंभाव का सर्वथा अभाव होकर मन, वाणी और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्त्तापन का अभिमान लेश मात्र भी न रहना।यदि किसी काल में सांसारिक घटना हो भी जाय तो धैर्य से जरा भी विचलित न होनाऔर सभी कर्मों के फल कामना का परमात्मा के लिये ही त्याग करना।सब भूतों में द्वेष भाव से रहीत;स्वार्थ रहीत,सबका प्रेमी,ममता रहीत,अहंकार रहीत,सुख-दुःख की प्राप्ति में सम और क्षमावान् अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देनेवाला,ध्यान योग में युक्त, निरन्तर लाभ-हानि में सन्तुष्ट, मन और इन्द्रियों सहीत शरीर को वश में किये हुये, परमात्मा में दृढ निश्चय वाला, परमात्मा में अर्पण किये हुये मन बुद्धि वाला, किसी भी जीव को उद्वेग न देनेवाला, स्वयं किसी जीव से उद्वेग को नहीं प्राप्त होने वाला, हर्ष से रहीत, दुसरों के उन्नति को देखकर होने वाले संताप से रहीत, भय और उद्वेगादिकों से रहीत, आकांक्षा से रहीत सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जलमृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि यानि बाहर की शुद्धि वाला,अन्तःकरण से स्वच्छ हो राग, द्वेष और कपट आदि विकारों से रहीत अर्थात भीतर की शुद्धि वाला,जिस काम के लिये आया था.उसको पूरा करने वाला यानि चतुर,पक्षपातरहीत,दुःखों से छुटा हुआ,सर्व आरम्भों का त्यागी अर्थात् मन,वाणी और शरीर द्वारा प्रारब्ध से होने वाले सम्पूर्ण स्वभाविक कर्मों में कर्त्तापन के अभिमान का त्यागी, शोच न करने वाला, शत्रु मित्र और मान-अपमान में समान रहने वाला,आसक्ति से रहीत,निन्दा-स्तुति को समान समझने वाला, ईश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला,जिस-किसी प्रकार से शरीर निर्वाह में सदा सन्तुष्ट,रहने के स्थान में ममता से रहीत, स्थिर बुद्धिवाला, भक्तिमान्,परमात्मा को परायण हुआ अर्थात् उसे परम आश्रय,परम गति,सबका आत्मरूप,सबसे परे, परम पूज्य समझने वाला विशुद्ध प्रेम से परमात्मा की प्राप्ति के लिये तत्पर,वेद,शाश्त्र,महात्मा और गुरुजनों तथा महेश्वर के वचनों में सदृश विश्वास यानि श्रद्धा वाला तथा निःस्वार्थ और निष्काम भाव से धर्म का रक्षक होना एवं किसी कार्य के लिये दृढ़ता पूर्वक आरूढ़ होना यानि आसन जमाकर मन और इन्द्रियों को वश में किये हुये बैठना। इसके अलावे यथोचित श्वास प्रश्वास गति का अवरोधन यानि प्राणायाम करते रहना।अपनी समस्त इन्द्रिन्यों को विषयवासना से विरत कर स्वस्ठ चित्त होना अर्थात संचित कुसंस्कारों एवं हेय प्रचलनों के आकर्षणों, दबावों को अस्वीकार कर सदा संघर्षशील रहना यानि प्रत्याहारका पालन करना।ईश्वर आत्मक्षमता, कर्त्तव्य कर्मों के दायित्व देवी देवताओं,मंत्रों,गुरुजनों एवं शाश्त्र पंथों में विश्वास कर धारणा करना।परमात्मा के अभीष्ट स्थिति का चिन्तन कर उनका ध्यान करना और लौकिकजीवन को पारलौकिक,परमार्थिक बना लेना। आत्मा को ईश्वर के अंश के रूप में देखना।संसार के प्रति विराट ब्रह्म की मान्यता रखना। आत्मसत्ता के स्वरूप,प्रयोजन एवं उपयोग के संबंध में तत्त्वदर्शी भूमिका का रहना यानि सदा-सर्वदा समाधि को अवस्था में ही रहना। इसके अलावे यथा संभव सम्पूर्ण धर्मों का आभाय,धर्म के निर्णय का विचार छोड़कर "क्या करना चाहिये था, और क्या नहीं करना चाहिरथा, क्या कर रहा हूँ और क्या नहीं कर रहा हूँ तथा क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।" का विचार घोड़कर सदा सर्वदा पूर्णरूपेन केवल परम प्रिय महाप्रभु परमब्रह्म परमपिता पर मेश्वर शिव के ही शरण में समर्पित रहना।

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