मेरा छात्र जीवन
जब मैं 6 वर्ष का एक भोला-बाला बालक था,तो मेरा नाम नामांकन राजकीय मध्य विद्यालय कौडिया में सन् 1981 ईस्वी में हो गया,जो मेरे घर के ठीक पास ही है।मेरा एक चचेरा भाई विजय है,जिसके साथ में रोज विद्यालय जाता और खेला-कुदा करता था। मेरे माता-पिता तथा घर के अन्य लोग मुझे मुन्ना नाम से पुकारते थे।विद्यालय की उपस्थिति पंजी पर मेरा नाम संजय कुमार था।उस समय मैं बिल्कुल अबोध सा था। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मैं विद्यालय में उपस्थिति तक नहीं बोलता था,जिसके कारण मेरा नाम हर महीने कट जाता था और मेरे बाबा स्वर्गीय रामकृपाल प्रसाद जी हर महीने नाम लिखवा आते थे।अंत में मेरे वर्ग शिक्षक महोदय श्री राम बहादुर सिंह जीं ने मेरे नाम के साथ कुशवाहा जोड़ दिया,जिससे कि मैं अपना नाम पुकारे जाने पर पहचान सकूं तथा उपस्थिति बोल सकूं। यही नहीं प्रथम वर्ग के वार्षिक परीक्षा में मैं फेल भी हो गया था,परंतु मुझे याद नहीं कि कैसे मेरा नामांकन पुनः दूसरे वर्ग में हो गया।इस वर्ग में भी मुझे संतोषजनक अंक प्राप्त हुआ तथा तीसरे वर्ग में प्रवेश कर गया। मैं अपने पास के इस स्कूल में सिर्फ तीसरे वर्ग तक ही पढ़ पाया। मेरे स्कूल के प्रधानाध्यापक श्री बलिराम सिंह जी थे। अन्य सहायक शिक्षकों को मैंने उनके उपनाम से ही जानता था- जैसे राय जी,शुक्ला जी इत्यादि। इन शिक्षकों के प्रभाव से ही मैं पुस्तक पढ़ना गिनती पहाड़ा इत्यादि सीख पाया था। मुझे याद है कि कुछ दिनों तक मेरे घर आकर एक निजी शिक्षक श्री भिखारी प्रसाद जी ने पढ़ाया,मैं इनसे विशेष रूप से डरता था। इनसे मैं बहुत कुछ सीखा।सन् 1984 ईस्वी में मैं अपने गांव से विदा ले लिया। मेरे पिताजी ने मुझे और मेरे भाइयों को माता के साथ हावड़ा पश्चिम बंगाल के शिवपुर नामक स्थान पर ले गए। वहां वे काम करते थे और वहीं मेरा जन्म स्थान था। वही मेरा नामांकन शीतल हिंदी विद्यालय में पुन- तीसरे वर्ग में हो गया।अब हम सब मैं और मेरे भाई पिताजी के कठोर नियंत्रण में रहने लगे।
रोज ब्रह्म बेला में उठकर पढ़ना शौचादि कर्म से निवृत्त हो पढ़ना स्नान के बाद भोजन करना स्कूल जाना नित्य कार्य था। हम सब प्रतिदिन अपने माता पिता के चरण स्पर्श करते थे। मुझे याद नहीं कि यह सब हमने कैसे सीख लिया था ? मुझे याद है कि मैं प्रतिदिन बीरबल तथा विनोद इत्यादि कुछ मित्रों के साथ व्यायाम भी करने जाता था, जो एक निजी संस्थान द्वारा प्रत्येक शाम को कराया जाता था।हमलोग 77नम्बर गुलाम हुसैन सरदार लैन में रहते थे। मेरे पिताजी शिवपुर जूट मिल में लिपिक के पद पर कार्यरत थे। उस समय उनका कारखाना कभी-कभी बंद हो जाया करता था।जिससे हमारी आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो जाती थी। जब हम लोग वहां पर थे तब उनका कारखाना करीब 6 महीने तक बंद हो गया। हम लोगों का नामांकन एक स्कूल में होने के कारण अपने प्रदेश नहीं आ सकते थे,क्योंकि इससे हमारी पढ़ाई चौपट हो जाती इस कारण हम लोगों को किसी तरह दयनीय आर्थिक परिस्थिति में वहां पर साल भर रहना पड़ा। दिसंबर 1984 में तीसरे वर्ग के वार्षिक परीक्षा में मैंने पूरे वर्ग में दूसरा स्थान प्राप्त किया।यहां के शिक्षकों के नाम तो मुझे याद नहीं। परंतु उन्होंने अपनी विद्वता से हमें बहुत ही प्रभावित किया। मेरा एक मित्र था जिसका नाम सुरेश था। हम दोनों एक ही साथ बेंच पर बैठते थे।स्कूल से छुट्टी होने पर एक ही समय घर जाते थे। हम दोनों एक आत्मा दो शरीर वाले हो गए थे।हम दोनों वार्तालाप के द्वारा एक दूसरे से ज्ञान का आदान-प्रदान किया करते थे। बचपन के उस मित्र को मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं तथा भगवान् से यही प्रार्थना करता हूं कि वह आज जहां भी हो सुखीपूर्वक रहे। मैं उसके आनंदमय जीवन की कामना करता हूं। सन् 1985 ईस्वी में हम लोग मैं और मेरे घर के सभी सदस्य अपने गांव लौट आए। यहां हमारा नामांकन बसंतपुर के कन्वेंट स्कूल शिशु विकास केंद्र मैं स्टैंडर्ड फोर्थ में हुआ यहां के शिक्षकों को भी मैं उनके उपनाम से ही जानता था।जैसे बड़े सर लंबे सर इत्यादि। साल भर इस इस स्कूल में पढ़ने के बाद में मेरा दाखिला आदर्श राजकीय मध्य विद्यालय, बसंतपुर में हो गया। मैं स्कूल में 3 वर्ष छठा सातवां आठवां वर्गों में पढा। इस स्कूल के विद्वान् शिक्षकों की अमिट छाप अभी भी हमारे जीवन पर है। जब मैं छठा वर्ग 'घ' में पढ़ता था,तो उस समय इस वर्ग के शिक्षक श्री रोशन सिंह जी थे,जो हम लोगों के गणित पढ़ाते थे।मुझे वह घटना याद है कि जब स्कूल में कोई शुल्क लगा था,तो मेरे पिताजी ने आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते,क्योंकि उस समय मेरे पिताजी का कारखाना बंद था, जिसके कारण शुल्क माफी के लिए एक आवेदन पत्र लिखकर दिया मैं श्री रोशन बाबू को आवेदन पत्र दिया।उन्होंने मुझे प्रधानाध्यापक के पास जाने को कहा। मैं प्रधानाध्यापक के पास जाने से अक्सर कतराता था,क्योंकि प्रधानाध्यापक क्रोधी स्वभाव के थे, खैर उस समय मैं किसी तरह प्रधानाध्यापक के पास गया और आवेदन पत्र दिया उन्होंने वह आवेदन पत्र देखकर पिताजी को बुलाया। मैंने पिताजी से यह स्थिति स्पष्ट कर दिया। पिताजी शर्मिंदा होने के चलते प्रधानाध्यापकजी के पास नहीं गए। किसी से पैसा लेकर उन्होंने मुझे दिया और मैं शुल्क जमा कर दिया। मुझे यह भी याद है कि छठे वर्ग की छमाही परीक्षा में अपने वर्ग के सभी खण्डों के सभी पाँच सौ लड़कों में गणित में दूसरा स्थान प्राप्त किया था।उस समय मेरा बड़ा नाम हुआ था। वार्षिक परीक्षा में मैंने अपने वर्ग के पूरे सौ लड़कों में चौथा स्थान प्राप्त किया।सन् 1988 ईस्वी में में वर्ग सातवां 'घ' का विद्यार्थी था। उस समय मेरे वर्ग शिक्षक महोदय श्री राम नारायण सिंह थे। वे संस्कृत के शिक्षक थे।उन्होंने मेरे जीवन को काफी प्रभावित किया।ये आदर्श के प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने अपने उपदेशों के द्वारा मुझे मांस-मछली खाना छुड़ाया। इन्होंने एक बार मुझे तथा मेरे वर्ग के साथियों को वर्ग में देवताओं को चित्र के समक्ष शपथ दिलाई। वस्तुतः इन्होंने ही मेरे अंदर स्थित धार्मिक भावना को जगाया।यदि वे हमारे छात्र जीवन में नहीं आए होते तो आज मेरा जीवन दूसरी दिशा में होता। इन्होंने हमारे जीवन को जो दिशा दिया,उसके लिए मैं इनका आजीवन ऋणी रहूंगा। इनके ही मार्गदर्शन में मैं अपने वर्ग में तीसरा स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैं अष्टम 'क' का विद्यार्थी हो गया। इस वर्ग के वर्गशिक्षक श्री नंदकिशोर सिंह जी थे।
तीन वर्षों तक इस विद्यालय में अध्ययन करने के बाद मैं इस स्कूल से बिदा ले लिया। इतने वर्षो में हमारे मित्रों में प्रमुख थे-सत्येंद्र सिंह,अमित कुमार कुशवाहा,शंकर शाह तथा महेश साह इत्यादि इतनी मित्रों के नाम आज तक याद है। इस विद्यालय में कुछ प्रमुख शिक्षकों का नाम गिनाना चाहता हूँ,जिन्होंने हमारे जीवन को प्रभावित किया इसमें सबसे पहले मैं इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री राजबल्लभ सिंह का नाम लेना चाहूंगा जिनके आदर्श जीवन से मैंने बहुत कुछ लिया। इसके अलावा श्री रोशन सिंह, श्री मिश्रा जी तथा श्री रमेश सिंह इत्यादि ने भी हमारे जीवन को काफी प्रभावित किया। सन् 1989 ईस्वी में मेरा नामांकन उच्च विद्यालय,बसंतपुर में नवम् वर्ग में हुआ ।इस वर्ग के शिक्षक श्री अजय श्रीवास्तव थे। मुझे याद है कि मैं पहली बार कक्षा में गया था तो इन्होंने हम छात्रों से प्रश्न किया था कि बादलो से भरे आकाश वाली रात गर्म क्यों होती है?इस प्रश्न का उत्तर हम छात्रों में से कोई नहीं दे पाया था। इसमें इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने हमें बहुत आच्छी तरह से समझाया,जिससे कि मुझे वर्ग में ही याद हो गया,परंतु उनके शिक्षण कार्य का यह ढंग आने वाले दिनों में नहीं रहा।
प्रायः विद्यालय के शिक्षकों की यह आदत बन गई थी कि जब किसी विषय की घंटी लगती थी तो वह या तो 15:20 मिनट देर से आते थे अथवा कोई बहाना कर घंटी नहीं करते थे। कभी-कभी वह घंटी करते सो अपवाद ही है। इसके अलावे कुछ ऐसे भी शिक्षक थे, जो घंटी करने आते तो वह पाठ्यक्रम की बात न पढ़ा कर इधर-उधर से बातें करके पूरी घंटी ही बिता देते थे। इसके अलावा मामूली सा फीस भी वसूली होता था,तो इस स्कूल को बंद कर दिया जाता था। हलांकि फीस वसूलने का काम सिर्फ 1 घंटे में ही किया जा सकता था। कभी-कभी यह स्कूल समय से पहले ही बंद हो जाया करता था। इसके अलावा इस स्कूल की सबसे खराब स्थिति यह थी कि स्कूल में तीन बार परीक्षाएं आयोजित की जाती थी,जो करीब डेढ़ महीने तक चलते थे क्योंकि पहले आंठवीं कक्षा की परीक्षा होती थी,तब नौवीं कक्षा की और तब दसवीं कक्षा की । इस तरह एक परीक्षा लेने में करीब-डेढ़ महीने लग जाते थे। रही सही पढ़ाई की कमर इन परीक्षाओं ने ही तोड़ दी थी। इसके अलावा राजनीति भी कभी-कभी हमारी पढ़ाई में हस्तक्षेप करती थी।जब मैं नवम् वर्ग में था। तब उस समय दिल्ली की गद्दी पर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी। इनकी सरकार नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण का कोटा बनाना चाहती थी। जिसका विरोध सारे भारतवर्ष में हुआ। इस विरोध प्रदर्शन में कालेज तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों का महत्वपूर्ण योगदान था,क्योंकि वे अधिकतर संपन्न वर्ग से आते थे। इस विरोध प्रदर्शन पर नियंत्रण पाने हेतु सरकार को करीब दो-तीन महीने तक अगस्त,सितंबर तथा अक्टूबर में स्कूल को बंद करना पड़ा। इसके अलावा दशम वर्ग में शिक्षकों के हड़ताल ने तो हमारी पढ़ाई ही चौपट कर दी। प्रायः छात्रों को अपनी पढ़ाई के लिए या तो स्वाध्याय पर आश्रित रहना पड़ता था अथवा ट्यूशन पर और ट्यूशन पढ़ाने वाले में सबसे आगे इसी हाई स्कूल के शिक्षक ही थे,जो अच्छे फीस पर छात्रों को पढ़ाया करते थे।वे शिक्षक विद्वान् थे पर अपनी विद्वता का उपयोग ट्यूशन के अलावे कभी स्कूल में नहीं किया। प्रायः हम और हमारे जैसे छात्रों को यह सपना ही बनकर रह गया कि ये शिक्षक हमें पढ़ाने के लिए भी पढ़ाने के लिए भी विद्वता का उपयोग करते। इन शिक्षकों के पास प्रायः संपन्न वर्ग के ही लड़के ट्यूशन पढ़ा करते थे। हम और हमारे जैसे छात्रों को उनके पास ट्यूशन करना एक सपना ही था। मैंने अपने पास ही के नीजी शिक्षक श्री मधुसूदन तिवारी जी के पास ट्यूशन किया। जो गणित के शिक्षक थे और हमारे जैसे छात्रों का एकमात्र सहारा थे। इनका फीस इन शिक्षकों की भांति नहीं था,जो छात्रों का शोषण करते थे। उनके निर्देशन में मैं गणित में तेज हुआ।प्रायः: जब स्कूल में घंटी खाली रहा करती तो सब लड़के जहां इधर-उधर की बातें करते थे,वहां मैं गणित बनाया करता था।


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