रविवार, 29 मार्च 2026

मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक

 मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक                                                                                                                  

        सन् 2021 के अगस्त महीने की पांचवीं तिथि-शिक्षक दिवस को माननीया ज्योति भाभी  के फेशबुक पोस्ट के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ कि शिक्षकों के मसीहा बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ,सीवान के पूर्व सचिव दिनेश चंद्र सिन्हा जी का निधन उनकी कर्मभूमि सिवान जिले के गोरेयाकोठी प्रखंड के भिट्टी में 17मई 2021सोमवार को दिल का दौरा पड़ने से हो गया है। इस घटना से मैं काफी मर्माहत और शोकग्रस्त हो गया।क्योंकि वे मेरे कार्यस्थल के मार्गदर्शक तथा अनुकरणीय व्यक्तित्व थे। वे तपी प्रसाद उच्च विद्यालय, भिट्टी के संस्थापक प्रधानाध्यापक थे तथा यहीं से अवकाश भी प्राप्त किए। वे कई संस्थाओं के संस्थापक थे।वे तपी प्रसाद उच्च विद्यालय भिट्टी के कुशल तथा कर्मठ प्रधानाध्यापक रहे एवं हमेशा विद्यालय में शिक्षा के स्तर तथा प्रशासन के प्रति जागरुक एवं इमानदार रहे।यही कारण है कि उनके निधन पर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष विधान परिषद सदस्य श्री केदरनाथ पांडेय  ने शोक व्यक्त करते हुए कहा था कि बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ की मजबूती और इसके         विभिन्न आंदोलनों में उनकी भूमिका अग्रणी की सूची में रही है।माध्यमिक शिक्षक संघ को सांगठनिक रूप से मजबूत और समृद्ध बनाने में श्री सिन्हा का बड़ा योगदान रहा है। तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्ठी में कार्यरत रहने के दौरान तथा बाद में भी मैं उनकै पास अक्सर ही जाया करता था तथा उनसे मार्गदर्शन लिया करता था। उनका मार्गदर्शन तथा व्यक्तित्व मुझे आज भी प्रभावित कर रहा है।मैं दिनांक 5 दिसंबर 2006 से 6अगस्त 2010 तक तपी प्रसाद उच्च  विद्यालय,भिट्ठी में कार्यरत था।उस अवधि में मैंने उनको काफी नजदीक से देखा था।


                                    वर्त्तमान समय में मैं झारखण्ड राज्य के पूर्वीसिंहभूम जिले के चाकुलिया नगर पंचायत में स्थित मनोहरलाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक के पद पर कार्य करते हुए अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूँ,परन्तु मेरे इस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता उनके द्वारा स्थापित तथा सिंचित तपी प्रसाद उच्च विद्यालय,भिट्टी,सिवान से होकर आता है। 5 दिसम्बर 2006 का वह सुनहला दिन,जिस दिन मैं प्रधानाध्यापक श्री मोतीलाल शर्मा के अधीन जिला परिषद माध्यमिक शिक्षक के पद पर योगदान किया था,मेरे लिए एक बहुत ही खुशी का दिन था,क्योंकि मेरे मन में एक उज्ज्वल भविष्य की कामना थी। मेरे योगदान के कुछ ही दिनों बाद मेरे पद की कोटि में ही छः अन्य शिक्षक भी योगदान दिए। इस विद्यालय में मैं 3 वर्ष 8 महीने तक कार्यरत रहा। झारखण्ड लोक सेवा आयोग,राँची द्वारा सहायक शिक्षक के पद पर चयनित हो जाने के कारण मैं सम्बन्धित विद्यालय में योगदान करने हेतु 6 अगस्त 2010 को विद्यालय से पदमुक्त हो गया।

            सिवान जिला मुख्यालय से करीब 32 कि. मी. दूर स्थित यह विद्यालय शिक्षा का आलोक फैलाकर जन-मानस को तृप्त कर रहा है।न जाने कितने रत्न यहाँ से निकले तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी आभा फैलाकर कीर्त्तिमान स्थापित कर रहे हैं,इसकी कोई गणना नहीं तथा भविष्य में भी ऐसा ही होता रहेगा।स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी द्वारा सिंचित यह विद्यालय अमूल्य कीर्ति के रुप में अनन्त समय तक बाल शिक्षा पिपासुओं की शिक्षा रुपी पिपासा को शान्त करता रहेगा। इस कार्य के लिए मैं विद्यालय की स्थापना में योगदान तथा त्याग करने वाले विद्यालय के संस्थापक सदस्यों में स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने इस विद्यालय को अपने खून तथा पसीने से सींचा,जिसके बदौलत यह विद्यालय सिर्फ जिले में ही नहीं अपितु पूरे राज्य में प्रसिद्ध हो गया। उनके द्वारा विद्यालय में बनाई गई व्यवस्थाएं तथा अनुशासन, जब मैं विद्यालय में योगदान किया,उस समय तक प्रभावी थीं तथा आगे भी जारी रहीं। विद्यालय में पूर्व से काम कर रहे साथीं शिक्षकों के माध्यम से मुझे  उनके द्वारा विद्यालय में किए गए कार्यों के बारे में बहुत सारी जानकारियां तथा प्रशंसाएं सुनने को मिलती थीं।उनके द्वारा विद्यालय में बनायी गयीं अच्छी परम्पराएँ मुझे कहीं अन्य विद्यालयों में देखने को नहीं मिलीं।विद्यालय का वातावरण  शांतिपूर्ण रहता था। सभी शिक्षक प्रेमपूर्वक अध्यापन कार्य करते थे। विद्यालय के सभी शिक्षक समय पर पहुँचते थे। सुबह प्रार्थना के बाद रोजाना एक-एक शिक्षक के द्वारा समाचार -वाचन का कार्यक्रम होता था,जो मुझे बहुत ही अच्छा लगता था। मैं भी सप्ताह में एक दिन समाचार वाचन करता था। समाचार वाचन से छात्र-छात्राओं को बहुत ही जानकारियां होती थी। वे लोग अपने आस-पास की राजनीतिक, सामाजिक,आर्थिक तथा अन्य सभी गतिविधियों से परिचित होते थे। 15 अगस्त तथा 26 जनवरी के आने के पहले विद्यालय के छात्र-छात्राओं को व्यायाम तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम की खूब तैयारी करायी जाती थी।इन सभी कार्यक्रमों के पीछे स्वर्गीय सिंह जी द्वारा पूर्व में बनायी गयीं अच्छी परम्पराओं का महत्त्वपूर्ण योगदान था।                                                                                            मैंने तीन प्रधानाध्यापकों का कार्यकाल देखा।श्री मोतीलाल शर्मा जी के सेवा निवृत्त होने के बाद श्री सच्चिदानन्द मिश्र प्रधानाध्यापक बने तथा उनके सेवानिवृत्त होने के बाद श्री ललित कुमार पाण्डेय प्रधानाध्यापक बने।इन सभी के कार्यकाल में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। विद्यालय में छात्रों को व्यायाम  कराने में दो शिक्षक श्री सच्चिदानन्द मिश्र तथा श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहा जी की बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी।खेल कूद से सम्बन्धित कार्य तथा लडकों को प्रशिक्षण श्री ललित कुमार पाण्डेयजी पूरी मेहनत से करते थे।वे लोग कड़ी मेहनत करके लडकों को तैयार कराते थे। हम सभी शिक्षक उनका सहयोग करते थे।प्रत्येक शनिवार को भी ये लोग व्यायाम तथा खेल कराते थे। इन वरिष्ठ शिक्षकों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विद्यालय की ये अच्छी परम्पराएँ मुझे कहीं अन्य विद्यालयों में देखनेको नहीं मिली।सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु मैं भी सक्रिय रुप से भाग लेता था। कई बार संस्कृत के पद्यों का छात्र-छात्राओं से सस्वर वाचन कराता था,जो कि सुनने में बहुत ही अच्छा लगता था।मुझे याद है कि मैंने एक बार पूर्ण रूप से अपने नेतृत्व में छात्रों को अंधेर नगरी चौपट राजा नाटक को तैयार कराया था तथा 15 अगस्त के शुभ अवसर पर सफलतापूर्वक मंचन भी कराया था। सांस्कृतिक कार्यक्रम में विद्यालय के दो शिक्षक एहसान अहमद तथा मोहम्मद आजम भी प्रायः मधुर गीत और शायरी सुनाया करते थे,जिनको सुनने के बाद मन आनन्दित हो जाता था।                                                                                                     गणित के शिक्षक श्री लक्षमण  पाण्डेयजी, हिन्दी के शिक्षक श्री सच्चिदानन्द मिश्र जी, समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री रमेश सिंह जी अपना अनुभव बाँटते थे।वे अवकाश की घण्टी में बहुत सारी अच्छी कहानियाँ तथा प्रसंग सुनाया करते थे,जिससे हमें बहुत सीख मिलती थी। अंग्रेजी के शिक्षक श्री मुस्तकमीन अंसारी तथा विज्ञान के शिक्षक श्री वीरेन्द्र सिंह भी अपने अनुभव तथा अच्छी बातें बताते थे,जिनसे हमें प्रेरणा मिलती थी। ये सभी बीच-बीच में हंसाने वाले चुटकुले भी कहा करते थे,जिससे हम सभी उदास मन को काफी तसल्ली मिलती थी। सामाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री चन्द्रप्रकाश प्रसाद जी तथा सोहेल अहमद जी, शारीरिक शिक्षक श्री कुबेरनाथ सिंह जी, उर्दू और फारसी के शिक्षक श्री एहसान अहमदजी तथा श्री म० आजमजी और विज्ञान के शिक्षक श्री रवीन्द्र वर्मा जी ये सभी हमारे समान उम्र के थे। इनसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर तथा विषय से सम्बन्धित भी अवकाश को घण्टो में चर्चाएँ चलती थी। सभी सौहार्द पूर्ण वातावरण में अपना विचार व्यक्त करते थे। शारीरिक शिक्षक श्री कुबेर नाथ सिंहजी हमलोगों के बीच एक मनोरंजन के पात्र थे,क्योंकि वे चिढते बहुत थे,हलाँकि थोड़ी देर में ही वे प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण बातें करने लगते थे। हम सभी प्रायः मनोरंजन हेतु उनको चिढ़ाते रहते थे। वे बच्चों को व्यायाम पूरी लगन तथा मेहनत से कराते थे तथा खेल भी करवाते थे। इसके अलावे वे हिन्दी की कक्षा भी लेते थे। विद्यालय के लिपिक श्री शिव जी सिंह तथा चपरासी श्री अदालत सिंह हमेशा अपने कार्यो में व्यस्त रहते थे। वे लोग व्यस्ततता के दिनों में अतिरिक्त भी मेहनत करते थे। श्री अदालत सिंह विद्यालय में रहकर रात्रि प्रहरी का भी काम करते थे।समाजिक विज्ञान के शिक्षक श्री हरिलाल प्रसाद कुशवाहा जी हमें अपना व्यवहारिक अनुभव बताते थे तथा मुझे स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने के लिए प्रेरित करते रहते थे।वे अपने विषय के साथ-साथ संस्कृत विषय भी पूरी लगन और श्रद्धा से पढ़ाते थे। उनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिला।प्रधानाध्यापक श्री ललित कुमार पाण्डेयजी से भी हमें बहुत सहयोग मिला,वे बहुत ही सहनशील व्यक्ति थे।वे लोगों के क्रोधपूर्ण बातों को भी हँसीपूर्वक टाल देते थे। विद्यालय छोड़ने के समय कागजी कार्रवाई में मुझे बहुत सहयोग मिला।उनके अधीन मैं बहुत अधिक दिनों तक कार्य किया। वे विद्यालय को आदर्श पूर्ण तरीके से चलाने का प्रयाश करते थे। उनका यह स्वभाव मुझे विशेष रूप से पसन्द था।मेरे जीवन पर विद्यालय का अमिट छाप पड़ा।इस विद्यालय के माध्यम से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला तथा अनुभव भी प्राप्त हुआ।एक तरह से यह विद्यालय मेरी तपोस्थली थी,जहाँ कम वेतन पर अधिक कार्य कर एक आदर्श स्थापित करना था। इसके लिए मैंने भरपूर प्रयास किया और इस काम में मैं कहाँ तक सफल हो सका,यह मुझे मालूम नहीं।मेरा सही मूल्यांकन तो उस समय के शिक्षक तथा छात्र ही कर पायेंगे। आज मैं अपनों से दूर, पहाड़ और घने जंगलों के बीच मैं यह सोचकर विचलित हो जाता हूँ कि काश वहाँ यदि सम्मानजनक वेतन मिला होता तो वहाँ के छात्र-छात्राओं के बौद्धिक विकास में अपना मामूली-सा योगदान दे पाता तथा मैं भी आनन्दपूर्वक अपने कर्तव्य के द्वारा स्वयं को सन्तुष्ट कर पाता।                                                                                      स्वर्गीय दिनेश चंद्र सिन्हा जी का जन्म 12 जून 1943 को बिहार के सारण जिले के पीरारी डीह गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम स्वर्गीय राम चरित्र सिंह तथा माता का नाम स्वर्गीय शीतला देवी था। इन्होंने सन् 1957 में मीठापुर के दयानंद विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा सन् 1959 में पटना विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट की परीक्षा,सन्1969 में ग्रेजुएट की परीक्षा तथा  सन्1971एमए की परीक्षा पास की में पास की।इनका शुभ विवाह 2 जुलाई 1965 को पटना के ग्राम-सेल्हौरी दुल्हिन बाजार के स्वर्गीय राम श्याम चरण सिंह की सुपुत्री कृष्णा सिंह से हुआ। इनके तीन भाई थे।ये तीन भाइयों में सबसे यह छोटे थे। इनके दो बड़े भाई स्वर्गीय बनारसी सिंह तथा बलराम सिंह थे। इनकी एक बड़ी बहन स्वर्गीय भागमती देवी थी। जिनका विवाह गिट्ठी के सम्मानित वर्मा परिवार में विद्यालय में संस्थापक सचिव स्वर्गीय राम आशीष वर्मा से हुआ था,जिनका प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को  पुण्यतिथि

 मनायी जाती है।विद्यालय में इनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित है। स्वर्गीय राम आशीष वर्मा इनके पूरे परिवार के लिए आदरणीय थे एवं कुशल अभिभावक की भूमिका में हमेशा मार्गदर्शन करते थे।उनके परिवार का सहयोग आज भी प्राप्त होता रहा रहा है। इन के तीन सुपुत्र हैं।जिनमें सबसे बड़े सुपुत्र सुमन कुमार इन्हीं का अनुसरण करते हुए उच्च विद्यालय में शिक्षक हैं। इनकी बहू श्रीमती ज्योति कुमारी सफलतापूर्वक अपने आवास के पास ही


विद्यालय को संचालित कर रही हैं। मझले सुपुत्र सिवान में व्यवसाय किए हुए हैं तथा सबसे छोटे पुत्र डॉ पंकज कुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इनकी दो पुत्रियां हैं,जिनमें पूनम कुमारी सभी भाइयों से बड़ी हैं, वे भी इन्हीं का अनुसरण करते हुए शिक्षिका हैं तथा सबसे छोटी सुपुत्री  वंदना कुमारी सेल में अभियंता के पद पर कार्यरत हैं।इस प्रकार इनके द्वारा विद्यालय के साथ-साथ पूरे परिवार को भी अच्छे संस्कार से संस्कारित किया गया, जो आज भी विभिन्न क्षेत्रों में सेवा का कार्य कर रहे हैं।


 

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